एचटी बिल्डिंग के सामने धरना देते हुए मरे मीडियाकर्मी का पुलिस ने लावारिस के रूप में किया अंतिम संस्कार

रविंद्र को नहीं मिल पाया अपनों का कंधा… साथियों का आरोप- HT प्रबंधन के दबाव में पुलिस ने लावारिस के रुप में किया अंतिम संस्‍कार… नई दिल्‍ली। 13 साल तक न्‍याय के लिए संघर्ष करने के बाद बुधवार की अंधेरी रात में मौत की आगोश में हमेशा-हमेशा के लिए सो जाने वाले हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के कर्मी रविंद्र ठाकुर को ना ही परिजनों का और ना ही अपने संघर्ष के दिनों के साथियों का कंधा मिल पाया। मंगलवार धनतेरस के दिन दिल्‍ली पुलिस ने उसकी पार्थिव देह का अं‍तिम संस्‍कार कर दिया। उसके अंतिम संस्‍कार के समय न तो उसके परिजन मौजूद थे और न ही उसके संस्‍थान के साथी।

रविंद्र ठाकुर के साथियों का आरोप है कि पुलिस ने हिंदुस्‍तान प्रबंधन के दबाव में जानबूझकर ऐसे दिन और समय का चुनाव किया कि जिससे कि हम उसके अंतिम संस्‍कार में पहुंच ही ना सके। उन्‍होंने बताया कि मंगलवार दोपहर को उन्‍हें दिल्‍ली पुलिस की तरफ से फोन आया कि रविंद्र के शव को अंतिम संस्‍कार के लिए सराय काले खां स्थित श्‍मशान घाट ले जाया जा रहा है। ये वो समय था जब वे दिल्‍ली हाईकोर्ट में थे और उनके केस की सुनवाई किसी भी समय शुरु हो सकती थी। जब तक हमारी सूचना पर दूसरे साथी श्‍मशान घाट पहुंचते तब तक पुलिस रविंद्र का अंतिम संस्‍कार करवा कर लौट चुकी थी।

उन्‍होंने बताया कि हम पुलिस से पहले दिन से ही मांग कर रह रहे थे कि यदि रविंद्र के परिजन नहीं मिल पाते हैं तो उसकी पार्थिव देह को हमें सौंप दिया जाए, जिससे उसका अंतिम संस्‍कार हम खुद कर सके। ऐसे में अचानक ऐसे समय में फोन आना जब हम हिंदुस्‍तान प्रबंधन से चल रही न्‍याय की लड़ाई से संबंधित एक केस के सिलसिले में कोर्ट में थे, दाल में कुछ काला है कि ओर संकेत करता है। पुलिस चाहती तो हमें समय रहते सूचित कर सकती थी, जबकि हम लगातार पुलिस के संपर्क में थे। उनका आरोप है कि पुलिस प्रबंधन पर दबाव बनाती तो रविंद्र के हिमाचल प्रदेश स्थित गांव का पता मिल जाता और आज उसके शव का लावारिस के रुप में अंतिम संस्‍कार नहीं होता। उन्‍होंने बताया कि इससे हम सकते में है। हमें ऐसी कतई उम्‍मीद नहीं थी कि बिड़ला जी के आदर्शों पर खड़ा यह मीडिया ग्रुप अपने एक कर्मचारी की मौत के बाद भी उसके परिजनों को उसके अंतिम संस्‍कार से महरुम रखने में अपनी ताकत का बेजा इस्‍तेमाल करेगा।

2004 में रविंद्र ठाकुर को हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने लगभग 400 अन्‍य कर्मियों के साथ निकाल दिया था। कड़कड़डूमा कोर्ट से जीतने के बावजूद भी ये कर्मी अभी तक सड़क पर ही हैं और अपनी वापसी के लिए अभी भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। रविंद्र कस्‍तूरबा गांधी स्थित हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की बिल्डिंग के बाहर ही रात को सोता था, जहां वह और उसके साथी अपने हक के लिए आंदोलन करते थे। बुधवार रात उसी धरनास्‍थल पर उसका निधन हो गया। समय के थपेड़ों ने रविंद्र को अंर्तमुर्खी बना दिया था। जिस वजह से वह अपने साथियों से अपने परिजनों के बारे में कुछ बात नहीं करता था।

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…xxx xxx

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ब्रेकिंग न्यूज़ लिखते-लिखते जब हम खुद ही ब्रेक हो गए…

Ashwini Sharma :  ”ब्रेकिंग न्यूज़ लिखते लिखते जब हम खुद ही ब्रेक हो गए…, अपनों ने झाड़ा पल्ला जो बनते थे ख़ुदा वो भी किनारे हो गए..” साल 2005 में मुंबई इन टाइम न्यूज़ चैनल के बंद होने के बाद मैंने ये पंक्तियां लिखी थीं..तब मेरे साथ इन टाइम के बहुत से पत्रकार बेरोज़गार हुए थे..कुछ को तो नौकरी मिल गई लेकिन कुछ बदहाली के दौर में पहुंच गए..वैसे ये कोई नई बात नहीं है कई चैनल अखबार बड़े बड़े दावों के साथ बाज़ार में उतरते हैं..बातें बड़ी बड़ी होती हैं लेकिन अचानक गाड़ी पटरी से उतर जाती है..जो लोग साथ चल रहे होते हैं वो अचानक मुंह मोड़ लेते हैं..जो नेता अफसर कैमरा और माइक देखकर आपकी तरफ लपकते थे वो भी दूरी बना लेते हैं..

कई बार तो अपनों को भी मुंह मोड़ते देखा है..आज मैं ये सब इसलिए लिख रहा हूं..क्योंकि कुछ दिन पहले ही देश के नामचीन अखबार हिंदूस्तान टाइम्स अखबार की ऑफिस के सामने ही एक पत्रकार ने तड़पते तड़पते दम तोड़ दिया..तेरह साल पहले चार सौ लोगों को नैतिकता की बात करने वाले अखबार ने एक झटके में निकाल दिया था..वो तेरह साल से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहा था..मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता..आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर वो ज़िंदा था..

कोर्ट कचहरी मंत्रालय सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में होने के बाद भी सब आंखों में पट्टी बांधे थे..सो आखिरकार उस कमजोर हो चुके इंसान ने एचटी के ऑफिस के सामने ही दम तोड़ दिया..मैं यही कहूंगा कि ये घटना उन सभी लोगों के लिए एक सबक है जो किसी न किसी मीडिया हाउस में तैनात हैं..मेरा मानना है कि हालात अच्छे भी हो तो मुगालता नहीं पालना चाहिए और हो सके किसी असहाय भाई की मदद अवश्य करें..

‘भारत समाचार’ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत टीवी पत्रकार अश्विनी शर्मा की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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हिंदुस्तान अखबार के चक्कर में जिले भर में बदनाम हो गया एक ग्रामीण पत्रकार

बरेली हिन्दुस्तान ने एक एजेंट पर टारगेट पूरा करने का दबाव बनाया. इसके तहत लाखों के विज्ञापन छपवा दिए. जब पेमेंट नहीं मिला तो एजेंट की ही तस्वीर छापकर दो बार पूरे जिले को बता दिया कि इसका हिन्दुस्तान के साथ कोई लेना-देना नहीं है. मामला बदायूं जिले का है. यहां के थाना सिविल लाइंस व ब्लाक सलारपुर इलाके के गांव बरातेगदार में रहने वाले नीरज राठौर जिले में हिंदुस्तान अखबार की लांचिंग के समय से ही स्थानीय एजेंट और स्थानीय पत्रकार हैं. उनकी डेटलाइन सिलहरी से तमाम खबरें भी प्रकाशित हो चुकी हैं.

साल 2014 से जून 2017 तक यहां तैनात रहे तत्कालीन ब्यूरो इंचार्ज जगमोहन शर्मा से नीरज राठौर के खास संबंध थे. संस्थान ने अमर उजाला और दैनिक जागरण की तर्ज पर समूचे ब्लाक के प्रधानों व सचिवों का विज्ञापन छापने का टारगेट नीरज को दे डाला. ब्यूरो प्रभारी ने भी संस्थान को आश्वस्त किया कि नीरज से टारगेट पूरा करवा लिया जाएगा. जून में जगमोहन को कुछ आरोपों के कारण संस्थान ने निकाल दिया. नतीजतन नीरज अकेले पड़ गये और पेमेंट अटक गया.

संस्थान ने इसी आरोप में नीरज के खिलाफ पहले मुकदमा दर्ज कराने का निर्णय लिया. पर वादी बनने के लिए एचआर, विज्ञापन विभाग या संपादकीय विभाग में कोई राजी नहीं हुआ. ऐसे में विज्ञापन छापकर नीरज को तीन लाख चार हजार 687 रुपये का बकाएदार बता दिया. यह भी कहा गया है कि नीरज से संबंधित किसी भी लेनदेन का जिम्मेदार हिन्दुस्तान नहीं होगा. यह भी माना जा रहा है कि अन्य बकाएदार एजेंटों पर दबाव बनाने के लिए हिन्दुस्तान ने यह कदम उठाया है.

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‘हिंदुस्तान’ के पत्रकार ने पत्र लिखकर आशंका जताई- ‘प्रबंधन के लोग मुझे जान से मारने की साजिश रच रहे हैं!’

सेवा में,

श्री विकास यादव

रीजनल एच.आर. मैंनेजर

हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि0

मेरठ

विषयः-  गैरकानूनी जांच के बहाने हत्या का षड्यंत्र रचते हुए अपने परिसर में बुलाने को बाध्य करने के सम्बन्ध में।

महोदय,

आपके द्वारा प्रेषित Email के क्रम में सादर ससम्मान अवगत कराना है कि आपके पत्र दिनांक 06.07.2017 के क्रम में 12.07.2017 को एक पत्र रजिस्टर्ड डाक से आपको प्रेषित किया गया था, उस पत्र के साथ संलग्नक-2 छुट्टी का वह पत्र था जो 03.03.2017 को बरेली यूनिट के सहायक प्रबन्धक एच.आर. श्री सत्येन्द्र अवस्थी को उप श्रमायुक्त बरेली के समक्ष प्राप्त कराया गया, जिसमें सभी चिकित्सा सम्बन्धी परचे अटैच थे। मैं सूचना देकर ही अस्वस्थता के चलते अवकाश पर हूं।

उप श्रमायुक्त बरेली के आदेश के वाबजूद मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार वेतन/भत्तों का एरियर धनराशि 3251135.75/-रू0 का भुगतान अभी तक नहीं किया गया है। आपने Email व रजिस्टर्ड डाक से भेजे गये पत्र दिनांक 24.08.2017 का बिन्दुवार उत्तर नहीं दिया है। सही तथ्यों को छुपाकर पुनः Email दिनांक 25.08.2017 को भेज दिया है। आरोपी होकर स्वयं मुझे बार-बार परिसर में आने के लिए आपका बाध्य करना यह प्रमाणित करता है कि आप मेरी हत्या की गहरी साजिश रचे हुए हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुझे तलब करने वाले आप स्वयं (श्री विकास यादव) एवं आपके मातहतों ने मुझे फर्जी मुकदमे में फंसाने, जान से मरवाने की धमकी दी है जिसकी लिखित शिकायत 22.02.2017 को उप श्रमायुक्त बरेली को की गयी है और दिनांक 12.07.2017 को आपके पत्र के जवाब के साथ भी संलग्नक-3 के रूप में जिसकी फोटो प्रति लगायी गयी है। शक्तिशाली आरोपी (श्री विकास यादव) द्वारा मुझे अपने प्रभाव क्षेत्र के परिसर में आने को बाध्य किया जा रहा है जो कि प्रचलित भारतीय कानूनों के अनुसार किसी भी हालत में विधिसंगत, न्यायसंगत, तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता है। साथ ही भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

अतः आपसे एक बार पुनः अनुरोध है कि मेरे पत्र दिनांक 24.08.2017 के क्रम में बिन्दुवार मुझे अवगत करायें एवं उसके उपरान्त ही मजिस्ट्रेट के समक्ष विधिक प्रावधानों के तहत बयान दर्ज कराने को तिथि नियत कराने की कृपा करें।

दिनांकः- 25.08.2017

भवदीय

(निर्मलकान्त शुक्ला)

वरिष्ठ उप संपादक

हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लि0,

बरेली यूनिट, बरेली ।

कोड-एम-77978

मो0-9411498700

प्रतिलिपिः-

1- उप श्रमायुक्त बरेली क्षेत्र बरेली को इस आशय से प्रेषित कि प्रकरण की जांच कराकर न्यायोचित कार्यवाही करने की कृपा करें ।

2- पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को इस आशय से प्रेषित कि विकास यादव व सत्येन्द्र अवस्थी के विरूद्ध आई.पी.सी. की सुसंगत धाराओं में आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने के आदेश देने की कृपा करें।

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मजीठिया वेज बोर्ड हड़पने वाले ‘हिंदुस्तान’ प्रबंधन ने डोमेस्टिक इनक्वायरी के नाम पर मीडियाकर्मी की प्रताड़ना शुरू की

सेवा में,
श्री विकास यादव
रीजनल एच.आर. मैनेजर
हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि.
मेरठ ।

विषयः-  NON-LEGAL CHARGE SHEET-CUM-INTIMATION OF DOMESTIC ENQUIRY

महोदय,

आपके पत्र दिनांक 21.08.2017, जिसके द्वारा मुझे दिनांक 26.08.2017 को हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि. के बरेली कार्यालय में डोमेस्टिक इन्क्वायरी में तलब करने की बात कही गयी है, के क्रम में सादर निवेदन करना है कि हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि. ने उप श्रमायुक्त बरेली के आदेश दिनांक 31.03.2017 के बाद भी मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन व भत्ते आदि के एरियर की बकाया धनराशि 3251135.75/-रू0 मय बयाज अदा नहीं की है। धनराशि 3251135.75/-रू0 को अदा करने के वजाय मुझे शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से परेशान करने को कथित मनगढंत, विधि विरूद्ध जांच की बात की जा रही है।

आपके इस पत्र के क्रम में कहना है किः-

1- यह कि तथा कथित डोमेस्टिक इन्क्वायरी श्रमजीवी पत्रकार एवं समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा शर्तें और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 के किस नियम व धारा के अन्तर्गत की जा रही है)।

2- यह कि दिनांक 06 जुलाई, 2017 व दिनांक 21 अगस्त, 2017 के पत्र में डोमेस्टिक इन्क्वायरी की बात कही है मगर आपने कथित आरोपों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया है। कृपया बिन्दुवार कथित आरोप पत्र उपलब्ध करायें।

3- यह कि हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि. को जांच कराने का अधिकार श्रम अधिनियम के किस नियम व प्रावधान के तहत प्राप्त हुआ है?

4- यह कि आपने प्रार्थी को हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि. का स्टैडिंग आर्डर (समझौता पत्र) जोकि श्रम अधिनियम के प्रावधान के तहत निजी क्षेत्र की किसी भी कंपनी/नियोक्ता वकर्मचारी के बीच होता है, बार-बार मांगने पर भी अब तक नहीं दिया है। श्रम विभाग से पंजीकृत स्टैडिंग आर्डर (समझौता पत्र) उपलब्ध कराया जाये, जिसका अध्ययन कर आपको कथित आरोपों का समुचित उत्तर दिया जा सके।

5- यह कि आपके द्वारा इस कपोल कल्पित प्रचलित भारतीय कानून के विपरीत की जा रही मनमानी जांच मुझे परेशान करने, उत्पीड़न कराने व मेरी हत्या की साजिश रचने का क्रम प्रतीत हो रही है। क्योंकि मैं आपके व बरेली यूनिट के एच.आर. प्रभारी श्री सत्येन्द्र अवस्थी के विरूद्ध जानमाल के नुकसान की धमकी देने की लिखित शिकायत दिनांक 22.02.2017 को उप श्रमायुक्त बरेली को पहले ही कर चुका हूं। भय व तनाव की वजह से ही अस्वस्थ चल रहा हूं और कार्यालय आने में असमर्थ बना हुआ हूं। यदि कोई निष्पक्ष जांच है, तो वह किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष ही विधिसंगत, न्यायसंगत और तर्कसंगत हो सकती है।

अतः आपसे विनम्र आग्रह है कि व्यापक न्याय हित में मेरे इस पत्र में वर्णित उपरोक्त बिन्दुओं का स्पष्ट उत्तर तथा कथित आरोप पत्र देते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष विधिक प्रावधानों के तहत बयान करने के लिए तिथि नियत कराके अवगत कराने की कृपा करें।

दिनांकः- 24.08.2017

भवदीय

निर्मलकान्त शुक्ला

वरिष्ठ उप सम्पादक

हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लि0
बरेली यूनिट, बरेली ।
कोड-एम-77978
मो0-9411498700

प्रतिलिपिः-
1-  एच.आर. प्रभारी, हिन्दुस्तान बरेली यूनिट बरेली।
2-  श्रम आयुक्त, उत्तर प्रदेश शासन।
3-  उप श्रमायुक्त बरेली क्षेत्र बरेली को इस आशय से प्रेषित कि प्रकरण की जांच कराके न्यायोचित कार्यवाही करने की कृपा करें।

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बहुत बड़े ‘खिलाड़ी’ शशि शेखर को पत्रकार नवीन कुमार ने दिखाया भरपूर आइना! (पढ़िए पत्र)

आदरणीय शशि शेखर जी,

नमस्कार,

बहुत तकलीफ के साथ यह पत्र लिख रहा हूं। पता नहीं यह आपतक पहुंचेगा या नहीं। पहुंचेगा तो तवज्जो देंगे या नहीं। बड़े संपादक तुच्छ बातों को महत्त्व नहीं दे। तब भी लिख रहा हूं क्योंकि यह वर्ग सत्ता का नहीं विचार सत्ता का प्रश्न है। एक जिम्मेदार पाठक के तौर पर यह लिखना मेरा दायित्व है। जब संपादक अपने अखबारों को डेरे में बदलने लगें और तथ्यों के साथ डेरा प्रमुख की तरह खेलने लगें तो पत्रकारिता की हालत पंचकुला जैसी हो जाती है और पाठक प्रमुख के पालित सेवादारों के पैरों के नीचे पड़ा होता है।

कल का आपका अखबार पढ़ा। जिसके आप प्रधान संपादक हैं। रविवासरीय हिंदुस्तान। कई अखबार लेता हूं लेकिन एक आदत सी है कि हिंदी के अखबार सबसे पहले पढ़ता हूं। पहली लीड थी – बाबा के बॉडीगार्ड की गोली से भड़की हिंसा, छह पुलिसकर्मी और दो निजी सुरक्षाकर्मियों पर देशद्रोह का केस। मुझे अजीब लगा। एक दिन पहले खट्टर सरकार के ठप पड़ जाने की सारी तस्वीरें पूरा देश देख चुका था। साफ था कि हिंसा भड़की नहीं हैं भड़कने दी गई है। खबर से ऐसा लगा कि अखबार ने सरकार को साफ बचा लेने की नीयत से पूरी खबर लिखी है। कई घटनाएं ऐसी होती हैं संपादक जी, जो संपादकीय विश्वसनीयता के चीथड़े उड़ाकर रख देती हैं। 32 हत्याओं और 200 से ज्यादा घायलों पर एक अखबार सत्य को जब परास्त करने की कोशिश करता है तो तथ्य की लाश पहले ही बिछ जाती है। लेकिन अब यह इतना साधारण सिद्धांत नहीं रहा।

मैंने फिर बाकी के अखबार पढ़े। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदू, नवभारत टाइम्स, भास्कर और आप ही के अखबार का सहोदर हिंदुस्तान टाइम्स। पढ़कर एक अजीब सी विरक्ति से मन उचट गया। एक तो खबरें ऐसी थी और दूसरे मैंने अपने प्रिय अखबार को सत्ता के तल्ले के नीचे कराहते देखा था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा था – “प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री हैं, बीजेपी के नहीं। कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है।” आपने कभी सुना है किसी अदालत ने किसी प्रधानंत्री पर ऐसा अविश्वास जताया हो? उसकी जवाबदेही को ऐसे चिन्हित किया हो? उसकी क्षमताओं को लेकर इस कदर आहत महसूस किया हो? अपने सीने पर हाथ रखकर खुद से पूछिए शशि जी आपने कभी सुना है ऐसा कि अदालत को याद दिलाना पड़े आप देश के प्रधानमंत्री हैं पार्टी के नहीं? सुना है तो इस पत्र को यहीं स्थगित समझें और नहीं तो एक पाठक की तकलीफ को समझने की कोशिश करें। सारे अखबारों को लगा कि यह खबर है सिवाए दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स के। आपके निबंध दोनों ही अखबारों में छपते रहते हैं। फिलहाल सिर्फ दैनिक हिंदुस्तान की बात क्योंकि पहली भाषा हिंदी होने के कारण उससे जुड़ाव ज्यादा है।

मुझे लगा कि अंदर के पन्ने में कहीं छोटी सी खबर होगी जरूर। इतनी महत्त्वपूर्ण खबर को 30 पन्ने के अखबार से उड़ाने के लिए जिगर चाहिए। कोई संपादक इतना निर्लज्ज और निष्ठुर नहीं हो सकता कि वो प्रधानमंत्री को पार्टी का प्रधानमंत्री कहे जाने पर एक भी कॉलम की जगह न दे। और सच में आप साहसी निकले। आपने सच में प्रधानमंत्री पर अदालत की टिप्पणियों को पाठकों की नजर से बचा लिया था। फिर मुझे हंसी आ गई। टिटिहरी के बारे में छात्र जीवन के किस्से की याद आ गई। आपने भी सुना होगा। टिटिहरी जब सोती है तो पैरों को आसमान की तरफ उठाकर रखती है। उसे लगता है कि आसमान को उसी ने थाम रखा है नहीं तो वो गिर जाएगा और सृष्टि खत्म हो जाएगी।

आपके मन में कहीं न कहीं ये जरूर रहा होगा कि अगर हिंदुस्तान खबर उड़ा देगा तो किसी को पता नहीं चलेगा और शहंशाह की नजरों में आपका नंबर बढ़ जाएगा। हर गुनहगार को चोरी करते हुए यही लगता है। वो चाहे शहर का चोर हो या खबर का। नंबर बढ़ने वाली बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि चौदहवें पन्ने पर ही सही आपने मुख्यमंत्री खट्टर पर अदालत की टिप्पणियों को तो जगह दी है लेकिन उसी टिप्पणी में नत्थी प्रधानमंत्री के गिरेबान को साफ बचा लिया है। इसलिए आप इस छूट के पात्र नहीं हैं कि रिपोर्टर ने खबर छोड़ दी या डेस्क वाले से भूल हो गई है। वैसे भी अदालत की खबर आपने एजेंसी से ली है और एजेंसी ने पूरी खबर दी थी। वैसे भी प्रधानमंत्री पर इतनी बड़ी टिप्पणी को ड्रॉप करने का फैसला प्रधान संपादक से नीचे का मुलाजिम नहीं ले सकता।

आप तो जादूगर निकले शशि जी। सधा हुआ मंतरमार। हमने देखा है कि जादूगर नजरों के सामने से ताजमहल गायब कर देता है। कुतुबमीनार गायब कर देता है। और तो और हंसता-खेलता बच्चा गायब कर देता है। आप खबर गायब कर देते हैं। लेकिन पत्रकारिता के इस अपराध को जादू करना एक और अपराध हो जाएगा। इसे होशियारी कहते हैं। लेकिन हर जादू के बाद का सच ये है कि मतिभ्रम स्थायी नहीं होता। सूचना के अतिरेक और रफ्तार के दौर में यह मान लेना ही विचित्र लगता है कि अगर वो तथ्य को छिपा ले जाएगा तो वह जनता तक नहीं पहुंचेगा। मैंने जानबूझकर जनता शब्द का इस्तेमाल किया है पाठक का नहीं। क्योंकि इस फूहड़ मजाक के जरिए आपने एक खास प्रजाति की राजनीति की अनुयायी जनता को ही संबोधित किया था वर्ना पाठकों के विश्वास की फिक्र किसी को इस कदर बेईमान हो जाने की छूट नहीं देती।

जब मुझे लोग बताते थे कि आज का संपादक रहते हुए बाबरी मस्जिद को गिराने के समय आज अखबार में कैसे-कैसे जादू किए थे तो लगता था आप कच्चे रहे होंगे। तजुर्बे के अभाव में आपके भीतर का सवर्ण हिंदू फुफकार मार उठा होगा। लेकिन अब लगता है कि आप कच्चे नहीं मंजे हुए थे। आप तो बरसों से अपनी लाइन पर चल रहे हैं। वो तो हम हैं जो अभी भी अखबार को अखबार और संपादक को संपादक माने बैठे हैं। प्रधानमंत्री पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की टिप्पणी को गोल करके मेरे जैसे लाखों पाठकों की बची-खुची धारणाओं को ध्वस्त कर दिया है।

एक अखबार का खाप में बदल जाना खराब लगता है शशि जी। इससे भी खराब लगता है किसी संपादक का उस खाप का नंबरदार बन जाना। हम सब सत्य के साथ खड़े रहने के साहस के दुर्भिक्ष के दौर में जी रहे हैं। ऐसे में एक और संपादक का बेपर्दा हो जाना हमारी तरह के आशावादी लोगों के लिए एक और सदमा है। इस अपराध के लिए पाठकों से माफी मांगकर आप इस विश्वास की रक्षा कर सकते हैं लेकिन क्या एक बड़े अखबार का संपादक होने का दंभ और प्रधानमंत्री की नजरों से उतार दिए जाने का भय आपको ऐसा करने देगा?

आज से दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स बंद कर रहा हूं। जानता हूं कि लाखों प्रतियों के प्रसार से एक प्रति का कम हो जाना राई बराबर भी महत्त्व नहीं रखता लेकिन पत्रकारिता के खापों को अपने ड्राइंग रूम में जानते-बूझते सजाकर रख भी तो नहीं सकता। सवाल केवल राम रहीम के डेरे का नहीं है। पत्रकारिता के डेरों और खापों का भी है। अफसोस, राम रहीम के डेरे के आतंक ने 32 नहीं 33 लाशें गिराई हैं। 33वीं लाश का नाम ‘हिंदुस्तान’ है।

आपका,

एक सुधी पाठक

नवीन कुमार

लेखक नवीन कुमार आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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गैस सिलेंडर खत्म होने के बारे में दस दिन पहले ही ‘हिंदुस्तान’ ने आगाह कर दिया था!

गोरखपुर में गैस सिलेंडर खत्म होने से तीस बच्चों की मौत के मामले में नया तथ्य यह सामने आया है कि हिदुस्तान अखबार ने गोरखपुर एडिशन में गैस सिलेंडर खत्म होने के बारे में दस दिन पहले ही आगाह कर दिया था और इससे जु़ड़ी खबर में सारे तथ्यों का हवाला दिया था. बावजूद इसके भ्रष्ट, काहिल और जनविरोधी अफसर चुप्पी साधे रहे. सामूहिक बाल संहार का इंतजार करते रहे. यहां तक कि गैस सिलेंडर खत्म होने वाले दिन भी हिंदुस्तान अखबार में एक विस्तृत खबर का प्रकाशन किया गया.

घटना से दो दिन पहले सीएम योगी भी गोरखपुर जाकर इसी अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे थे और समीक्षा बैठक की थी लेकिन भ्रष्ट अफसरों ने उन्हें हकीकत से रुबरु नहीं कराया. स्वास्थ्य विभाग में उपर से नीचे तक पसरे भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के कारण ही दर्जनों बच्चों की जान गई. इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर योगी और मोदी सरकार की तगड़ी आलोचना हो रही है. पढ़िए 30 जुलाई को हिंदुस्तान अखबार में छपी खबर जिसमें गैस सिलेंडर खत्म होने को लेकर आगाह किया गया था…

 

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धिक्कार है ‘हिंदुस्तान’ अखबार और इसके संपादक विश्वेश्वर कुमार पर!

बनारस से छप कर हिंदुस्तान अखबार गाजीपुर पहुंचता है. बनारस के संपादक हैं विश्वेश्वर कुमार. बेहद विवादित शख्सियत हैं. जहां रहें, वहीं इनके खिलाफ लोगों ने विद्रोह का बिगुल फूंका. भागलपुर में तो लोगों ने इनके खिलाफ लिखकर सड़कों को पोस्टरों बैनरों से पाट दिया था. ये समाचार छापने में राग-द्वेष का इस्तेमाल करते हैं. ये ‘तेरा आदमी मेरा आदमी’ के आधार पर आफिस का कामकाज देखते हैं. ताजी हरकत इनकी ये है कि इन्होंने अपने ही अखबार के रिपोर्टर को एक पूर्व मंत्री द्वारा धमकाए जाने की खबर को अखबार में नहीं छापा.

विश्वेश्वर कुमार के लिए शर्म की बात ये है कि दूसरे अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छाप दिया है. अब या तो विश्वेश्वर कुमार को संपादक पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर चुल्लू भर पानी लेकर इसमें अपनी पत्रकारिता को डुबो कर मरने के लिए छोड़ देना चाहिए. अगर विश्वेश्वर कुमार को प्रधान संपादक शशिशेखर ने खबर छापने से रोका है तो उन्हें इसका खुलासा करना चाहिए. उन्हें उन हालात के बारे में लिखना चाहिए, बताना चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर, किसके कहने पर, किस विवेक से इस खबर को छापने से मना कर दिया. आखिर जब आप अपने रिपोर्टर के मुश्किल वक्त में नहीं खड़े हो सकते तो आप काहें के संपादक और कहां के मनुष्य.

हिन्दुस्तान अखबार के पीड़ित पत्रकार की खबर अमर उजाला गाजीपुर एडिशन में फर्स्ट पेज पर छपी है. दैनिक जागरण के गाजीपुर संस्करण में भी ये खबर छपी है. लेकिन हिन्दुस्तान पेपर ने अपने ही पत्रकार को धमकाने की खबर को गाजीपुर एडिशन में प्रकाशित नहीं किया. हिंदुस्तान गाजीपुर के रिपोर्टर अजीत सिंह को करप्शन से संबंधित खबर छापने के कारण एक पूर्व मंत्री द्वारा धमकाए जाने के बाद गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक ने एक सुरक्षा गार्ड प्रदान किया है. साथ ही पत्रकार की तहरीर पर पूर्व मत्री ओम प्रकाश सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

हिंदुस्तान बनारस के संपादक विश्वेश्वर कुमार को बताना चाहिए कि उन्होंने पत्रकारिता के किस नियम का संज्ञान लेकर अपने ही रिपोर्टर को धमकाए जाने, उसकी तहरीर पर पूर्व मंत्री के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने की खबर का प्रकाशन नहीं किया. क्या उन्हें उनके गाजीपुर कार्यालय ने इससे संबंधित कोई खबर दी ही नहीं? अगर ऐसा है तो नाकारा गाजीपुर ब्यूरो को बर्खास्त कर देना चाहिए. अगर गाजीपुर ब्यूरो ने खबर भेजी तो उसे किसने किस हैसियत में रोका और किस कारण से रोका? पत्रकारिता तो पारदर्शिता का नाम है. उम्मीद है विश्वेश्वर कुमार का जमीर जगेगा और वे इन सवालों का जवाब कम से कम सोशल मीडिया पर ही देंगे ताकि लोग उनकी विश्वसनीयता पर भरोसा कर सकें. अगर वो जवाब नहीं देते हैं तो फिर हर कोई उनके बारे में एक राय कायम करने को स्वतंत्र हैं कि वो किस श्रेणी के संपादक रह गए हैं.

गाजीपुर से सुजीत कुमार सिंह ‘प्रिंस’ की रिपोर्ट. संपर्क : 9451677071

मूल खबर…

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शशि शेखर जी, आपके अखबार ने ‘इंसाफ इंडिया’ संग जो नाइंसाफी की है, क्या उसकी भरपाई करेंगे?

‘इंसाफ इंडिया’ एक समाजिक न्याय पर काम करने वाला संगठन है. लेकिन दैनिक हिन्दस्तान अखबार ने इसे सिमी की तर्ज पर उभरता हुआ संगठन बता कर लंबा चौड़ा आर्टकिल छाप दिया. इस संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि हिंदुस्तान अखबार ने खबर में संगठन पर कई गंभीर, मंगढ़त और बेबुनियाद आरोप लगाए हैं. इसके चलते अखबार प्रबंधन को लीगल नोटिस भेजा गया है.

संगठन से जुड़े मुस्तकीम सिद्दीकी बताते हैं-

”इंसाफ इन्डिया अधिकारिक रूप से 14/10/2016 को बनी. कम समय में ही स्वार्थरहित एवं निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने इसे दरवाजे-दरवाजे तक न्याय, अधिकार, मानवता एवं समानता के लिए काम करने वाले संगठन के रूप में स्थापित किया. झारखंड राज्य के कई ज़िलों में आज इंसाफ इन्डिया को एक बड़ा बदलाव लाने वाले संगठन / मुहिम के तौर पर देखा जा रहा है. इंसाफ इन्डिया ने कई मुद्दे उठाए. धर्म, जाति एवं समुदाय से ऊपर उठकर आवाजें बुलंद की. यह मुहिम हर उस परिवार, समुदाय, जाति एवं धर्म के लोगों के साथ है जो किसी भी तरह के अत्याचार, अन्याय एवं जुल्म के शिकार हो रहे हैं. इंसाफ इन्डिया किसी भी धार्मिक या राजनीतिक संगठन द्वारा समर्थित या प्रायोजित मुहिम नहीं है. यह देश के हर आम नागरिक का, आम नागरिक द्वारा, आम नागरिक के लिये एक मुहिम है. इंसाफ इंडिया ने पिछले कुछ दिनों में बिहार, झारखण्ड व पश्चिम बंगाल में दलितों-अल्पसंख्यकों व महिलाओं के हिंसा-उत्पीड़न व बलात्कार की घटनाओं को अहिंसक-लोकतांत्रिक तरीके से उठाने का काम किया है. सांकृतिक राजधानी देवघर की 5 साल की नन्ही कुमारी का अपहरण, बलात्कार एवं हत्या का मामला हो या अमेठी की 17 साल की सरिता मौर्या का अपहरण, ब्लातकार एवं हत्या, चाहे गिरीडिह के 20 साल के राजकुमार हेंबरम की पुलिस लापरवाही से मौत या कोडरमा के 52 साल के प्रदीप चौधरी की पुलिस द्वारा हत्या, इंसाफ इंडिया ने मुखर होकर इन सभी मामलों में आवाज उठाई है. बिहार के नवादा में रामनवमी के वक्त बीजेपी सांसद-केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के इशारे पर भगवा गुंडों व पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से की गई साम्प्रदायिक हिंसा और बिहार-झारखण्ड के दर्जनों जगहों पर हुई इस किस्म की घटनाओं के खिलाफ इंसाफ इंडिया के संयोजक मुखर रहे हैं. हाल के दिनों में जारी मॉब लिचिंग व साम्प्रदायिक आधार पर नफरत फैलाये जाने के खिलाफ भी इंसाफ इंडिया सक्रिय रहा है. यही सब सक्रियता ही इस संगठन का गुनाह बन गया है. गौ-आतंकियों और साम्प्रदायिक नफरत-हिंसा के सौदागरों को खुली छूट देने वाली सत्ता और इसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से इंसाफ की आवाज बुलन्द करने वालों को आतंकी बताया जाना इस देश के लोकतंत्र का दुर्भाग्य है.”

इंसाफ इंडिया के पदाधिकारी मुस्तकीम सिद्दीकी हिंदुस्तान अखबार के झारखंड के संपादकों / रिपोर्टरों से पूछते हैं कि आखिर वे किस आधार पर सिमी के समानांतर इंसाफ इंडिया को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. कोई एक गतिविधि बताएं जिससे इंडिया इंडिया के क्रियाकलाप को संदिग्ध गतिविधी के रूप में दर्ज किया जा सके. इस संगठन ने कौन-सा सरकार विरोधी किया कार्य किया है? सांप्रदायिक तौर पर भड़काने का कोई एक उदाहरण दें हिंदुस्तान अखबार के संपादक और रिपोर्टर. इंसाफ इंडिया ने मुस्लिम एकता मंच का साथ कब और कैसे दिया, कोई एक सबूत पेश करें. 24 परगना का दौरा क्या कोई समाजिक संगठन नहीं कर सकता, यहां दौरा करने पर प्रतिबंध का उल्लेख कहां लिखा है? 17 जुलाई को बिहार के नालंदा में इंसाफ इंडिया की कोई सभी नहीं थी. पुलिस के साथ कभी भी या कहीं भी संगठन के लोग नही भिड़े हैं. अगर भिड़े होते तो संगठन के लोगों पर एफआईआर दर्ज होती. इन सारे सवालों का जवाब हिंदुस्तान अखबार को देना चाहिए अन्यथा उन्हें पहले पन्ने पर उतना ही बड़ा माफीनामा छाप कर माफी मांगनी चाहिए जितना बड़ा उन्होंने इंसाफ इंडिया को बदनाम करने के लिए प्रकाशित किया है.

आखिर में मुस्तकीम कहते हैं-

”मेरा सवाल हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर जी से है कि आपके अखबार ने जो नाइंसाफी ‘इंसाफ इंडिया’ संगठन के साथ की है, क्या आप उसकी भरपाई कर सकेंगे? क्या दोषी संपादकों और रिपोर्टरों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे? क्या माफीनामा छाप कर इंसाफ इंडिया के दिल पर लगे घाव-दाग को धोने-खत्म करने की कोशिश करेंगे?”

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खुद अपनी तारीफ लिख और इसे विज्ञापन के रूप में छपवा कर मुकेश सिंह नामक शख्स साहित्यकार बन गया!

लोग जाने कौन कौन सा रोग पाल लेते हैं. खासकर वे लोग जो पैसा तो कमा लिए हैं, पर उनके दिल की कामना पूरी नहीं हुई. किसी की इच्छा साहित्यकार बनने की होती है तो किसी की सेलिब्रिटी. ऐसे में ये लोग अपनी आरजू के लिए भरपूर पैसा बहाकर खुद से ही खुद को साहित्यकार / सेलिब्रिटी घोषित कर लेते हैं.

उमेश कुमार नामक एक न्यूज चैनल संचालक एक जमाने में इंडिया टुडे में अपनी दो पन्ने की फीचर परिशिष्ट (यानि विज्ञापन) छपवाकर खुद को सेलिब्रिटी घोषित करता फिरता था तो इन दिनों लखनऊ के मुकेश सिंह नामक सज्जन हिंदुस्तान अखबार में खुद ही अपने हाथों अपनी प्रशंसा लिखकर और उसे पैसे देकर विज्ञापन के रूप में छपवाकर अपने को साहित्यकार घोषित कर चुका है.

लोग पूछने लगे हैं कि ये अचानक से मुकेश सिंह नामक नया साहित्यसेवी कहां से पैदा हो गया. दरअसल हिंदुस्तान लखनऊ में 24 जुलाई को अंदर पूरा का पूरा एक पेज (पेज नंबर 7) मुकेश सिंह के नाम समर्पित है. इस पेज के बारे में हिंदुस्तान अखबार के फ्रंट पेज पर सूचना दी गई है कि अंदर मुकेश सिंह पर एक विज्ञापन परिशिष्ट है.

जो लोग पहले पन्ने पर सूचना न पढ़े होंगे वे मुकेश सिंह नामक नए साहित्यकार का प्राकट्य उत्सव मनाने में लग गए होंगे. लोग इस तरह के विज्ञापन को पेड न्यूज की श्रेणी में रख रहे हैं और हिंदुस्तान अखबार की विज्ञापन पालिसी पर सवाल उठा रहे हैं. साथ ही सवाल उठ रहे हैं हिंदुस्तान के संपादकों पर जिन्होंने ऐसे पेड कंटेंट जाने दिया. 

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हिन्दुस्तान का सालाना सकल राजस्व 1294 करोड़, फिर भी छठी कैटेगिरी

हिन्दुस्तान समाचार पत्र लगातार झूठ पर झूठ बोलने पर आमादा है। हिन्दुस्तान ने मजीठिया का लाभ देने से बचने के लिए अपने को गलत व मनमाने तरीके से 6वीं कैटेगिरी में दर्शाया है जबकि ये अखबार नंबर वन कैटेगिरी में आता है। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के संबंध में भारत सरकार से जारी गजट के पृष्ठ संख्या 11 पर खंड 2 के उपखंड (क) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान की विभिन्न इकाइयों/शाखाओं/कंपनियों को समाचार पत्र की एकल इकाई ही माना जाएगा, चाहे उनके नाम अलग-अलग ही क्यों न हों।

इसके बावजूद हिन्दुस्तान अखबार कंपनी का Classification गलत व मनमाने तरीके से अपने आप करने Lower कैटेगिरी में दर्शा रहा है। उदाहरण के तौर पर हिन्दुस्तान की बरेली यूनिट 10 अक्टूबर 2009 को खुली। मजीठिया मामले में कंपनी केवल अपनी इसी यूनिट के राजस्व के आधार पर कैटेगिरी निर्धारित कर रही है। यानि वर्ष  2008-09 का 72 लाख, वर्ष 2009-10 का 2.72 करोड़ सकल राजस्व दर्शा रही है।

जबकि हिन्दुस्तान अखबार की मदर संस्था एचटी मीडिया लिमिटेड के वर्ष 2007-08, वर्ष 2008-09 व वर्ष 2009-10 के सकल राजस्व के औसत राजस्व से हिन्दुस्तान समाचर पत्र की कैटेगिरी तय होगी। एचटी मीडिया लिमिटेड ने FORM 23 ACA जो प्रत्येक वर्ष दाखिल किया है, उसमें वर्ष 2007-08 का 1226 करोड़ 91 लाख 84 हजार, वर्ष 2008-09 का 1355 करोड़ 77 लाख 17 हजार, वर्ष 2009-10 का 1299 करोड़ 11 लाख 60 हजार सकल राजस्व प्राफिट एंड लॉस एकाउंट में दर्शाया है। इस आधार पर कंपनी का सकल राजस्व 1294 करोड़ 60 लाख 20 हजार 333 रुपये होता है। कंपनी नंबर वन कैटेगिरी में आती है।

मजीठिया देने से बचने के लिए हिन्दुस्तान अखबार को अपने को अमर उजाला से एक पायदान नीचे 6वीं कैटेगिरी का बताने में भी कोई शर्मिंदगी नहीं है। अमर उजाला भी अपनी सभी यूनिटें अलग-अलग कंपनी की दर्शाकर 5वीं कैटेगिरी में दर्शाकर कर्मचारियों के हकों पर डाका डालने पर आमादा है।

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इन दोनों बड़े अखबारों में से कोई एक बहुत बड़ा झुट्ठा है, आप भी गेस करिए

हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबारों ने एक रोज पहले पन्ने पर लीड न्यूज जो प्रकाशित की, उसके फैक्ट में जमीन-आसमान का अंतर था. हिंदुस्तान लिख रहा है कि यूपी में सड़कों के लिए केंद्र ने पचास हजार करोड़ रुपये का तोहफा दिया वहीं दैनिक जागरण बता रहा है कि सड़कों के लिए राज्य को दस हजार करोड़ रुपये मिलेंगे. आखिर दोनों में से कोई एक तो झूठ बोल रहा है.

आप भी गेस करिए, इन दो में से बड़ा वाला झुट्टा कौन है….

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में ‘हिंदुस्तान’ अखबार को क्लीनचिट देने वाली शालिनी प्रसाद की झूठी रिपोर्ट देखें

यूपी में अखिलेश यादव सरकार के दौरान श्रम विभाग ने झूठी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एचटी मीडिया और एचएमवीएल कंपनी यूपी में अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ की सभी यूनिटों में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करके सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह अनुपालन कर रही है. श्रम विभाग की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने 06 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में अखबार मालिकों के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका संख्या- 411/2014 में सुनवाई के दौरान शपथपत्र के साथ दाखिल की है.

इसके मुताबिक यूपी में सिर्फ हिन्दुस्तान अख़बार ने ही मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया है. रिपोर्ट में बताया गयाहै कि यूपी में हिन्दुस्तान की कुल दस यूनिटें हैं जिनमें 955 कर्मचारी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दुस्तान लखनऊ में 159, मेरठ में 75, मुरादाबाद में 68, गोरखपुर में 51, अलीगढ़ में 48, बरेली में 82, नोएडा में 224, वाराणसी में 84, इलाहाबाद में 47, कानपुर में 117 कर्मचारी हैं. यानि कुल मिलाकर 955 कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से लाभान्वित कर रहा है. रिपोर्ट नीचे दिया जा रहा है. पढ़ने के लिए संबंधित स्क्रीनशाट पर क्लिक करें दें…











पूरे मामले को समझने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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बिना रजिस्ट्रेशन हिंदुस्तान अखबार का मुंगेर संस्करण छापने पर मालिक, संपादक, प्रकाशक समेत कइयों के खिलाफ मुकदमा लिखने के आदेश

बिहार के मुंगेर से सूचना है कि दैनिक हिन्दुस्तान प्रबंधन द्वारा अखबार के फर्जी संस्करण का मुद्रण, प्रकाशन और वितरण के मामले में अदालत ने दैनिक हिन्दुस्तान के मालिक और अन्य के विरूद्ध धारा 420 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है. मुंगेर से पत्रकार श्रीकृष्ण प्रसाद ने बताया कि बिना रजिस्ट्रेशन ही फर्जी तरीके से दैनिक हिन्दुस्तान अखबार का मुंगेर संस्करण 20 अप्रैल 2012 को लांच किया गया और अब तक अखबार अवैध तरीके से छापा व बांटा जा रहा है.

साथ ही इसमें सरकारी विज्ञापन भी छापे जा रही हैं. इस मामले में जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी जैनेन्द्र कुमार की अदालत ने 20 अप्रैल 2017 को दैनिक हिन्दुस्तान अखबार के मालिक, संपादक, प्रकाशक, मुद्रक और मुंगेर कार्यालय के प्रभारी के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420, 471, 476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 12, 13, 14, 15, 16ए0 और 16 बी0 के तहत पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करने का ऐतिहासिक आदेश पारित किया.

न्यायालय ने अपने 20 अप्रैल 2017 के आदेश में स्पष्ट लिखा है-  ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान अखबार को भागलपुर संस्करण छापने हेतु रजिस्ट्रेशन नंबर प्राप्त है, परन्तु प्रबंधन बिना रजिस्ट्रेशन नंबर के फर्जी तरीके से हिन्दुस्तान अखबार का मुंगेर संस्करण का मुद्रण, प्रकाशन और वितरण मुंगेर में करता आ रहा है।”

न्यायालय ने आदेश में आगे लिखा है- ‘‘परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद का कहना है कि चूंकि जिला पदाधिकारी (मुंगेर) ने दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर संस्करण को विधिमान्य नहीं माना है, इस आलोक में वे चाहते हैं कि लोक प्राधिकार दैनिक हिन्दुस्तान के मालिक, संपादक, प्रकाशक, मुद्रक और मुंगेर कार्यालय के प्रमुख के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420, 471, 476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 12, 13, 14, 15, 16 ए और 16 बी के तहत प्राथमिकी दर्ज करें.”

लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी श्री केके उपाध्याय ने अदालत कार्यवाही में अनुपस्थित रहे और अपने प्रतिनिधि को भी नहीं भेजा. यही नहीं, केके उपाध्याय ने बिहार लोक शिकायत निवारण अधिनियम को मानने से लिखित रूप में इन्कार कर दिया है, यह कहकर कि ‘मैं लोक प्राधिकार नहीं हूं, मैंने अपने वरीय पदाधिकारी से मार्ग दर्शन मांगा है जो अप्राप्त है.‘

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा है कि अधिनियम की कार्यसूची के क्रमांक 07 पर जिला स्तर पर प्रेस से संबंधित शिकायत, विज्ञापन, प्रकाशन के मामले में लोक प्राधिकारी जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी को बनाया गया है. परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद ने मुख्यमंत्री (बिहार) को पत्र लिखकर मुंगेर के जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी श्री केके उपाध्याय की शिकायत की है.

परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद ने न्यायालय में यह वाद 3 फरवरी 2017 को लाया था और आरोप लगाया था कि अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन उगाही के लिए दैनिक हिन्दुस्तान फर्जी तरीके से मुंगेर संस्करण आज भी छापता आ रहा है.

ज्यादा जानकारी के लिए पत्रकार व परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद से संपर्क 09470400813 के जरिए कर सकते हैं.

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‘हिन्दुस्तान’ अखबार को मजीठिया क्रांतिकारियों ने हराया, जीएम व संपादक की आरसी कटी

बरेली से बड़ी खबर आ रही है कि उपश्रमायुक्त ने हिन्दुस्तान के महाप्रबंधक और स्थानीय संपादक के खिलाफ मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार तीन कर्मचारियों के वेतन व एरियर की बकाया वसूली के लिए आरसी जारी कर जिलाधिकारी को भेज दी है। हिन्दुस्तान प्रबंधन को सोमवार को श्रम न्यायालय में करारी हार का सामना करना पड़ा। इस खबर से हिन्दुस्तान के उच्च प्रबंधन में हड़कंप मच गया है। हालांकि हिन्दुस्तान प्रबंधन सोमवार को आरसी का आदेश रिसीव होने तक उसे रुकवाने के लिए आला अफसरों के जरिये दबाव बनाने में लगा रहा।

हिन्दुस्तान बरेली के चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा, सीनियर सब एडिटर निर्मलकांत शुक्ला, चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर कॉपी एडिटर रवि श्रीवास्तव, पेजीनेटर अजय कौशिक ने माह सितम्बर, 2016 में श्रमायुक्त को शिकायत भेजी थी कि उनको मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार वेतन भत्ते आदि नहीं मिल रहे हैं।

इस शिकायत को श्रमायुक्त ने निस्तारण के लिए उपश्रमायुक्त बरेली को भेज दिया। नोटिस जारी होने पर प्रबंधन की धमकियों और दबाव के चलते सुनील मिश्रा, रवि श्रीवास्तव और अजय कौशिक ने डीएलसी के समक्ष उपस्थित होकर शिकायत वापस ले ली जबकि बरेली से मजीठिया की लड़ाई की रणनीति सुनील मिश्रा ने तैयार की थी और शिकायत करने के लिए लोगों को प्रेरित किया था।

चार माह तक चली सुनवाई के दौरान प्रबंधन की ओर से क्लेमकर्ताओं को डराया व धमकाया भी गया लेकिन क्लेमकर्ता इस लड़ाई से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। इसी बीच सीनियर सब एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा भी मजीठिया की लड़ाई में उतर गए। हालात यह हैं कि हिन्दुस्तान बरेली में मजीठिया की आग अंदर ही अंदर धधक रही है। लगभग 50 फीसदी कर्मचारी अपना क्लेम बनवाकर पूरी तैयारी में हैं और लगातार मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे लोगों के सम्पर्क में हैं।

सुनवाई की पिछली तारीख 25 मार्च को भी प्रबंधन की ओर से मौजूद एचआर मैनेजर सत्येन्द्र अवस्थी ने मामले को लंबा खींचने के लिए तमाम कोशिशें कीं लेकिन क्लेमकर्ताओं के आगे उनकी एक न चली। डीएलसी ने उसी दिन प्रबंधन को साफ कर दिया कि आपका पक्ष सुन लिया गया है और भी कुछ कहना है तो आज ही पत्रावली पर लिखा दीजिए। इस पर प्रबंधन के प्रतिनिधि सत्येन्द्र अवस्थी ने लिखित बयान दिया कि अब प्रबंधन की ओर से इस प्रकरण में कुछ भी कहना शेष नहीं है। डीएलसी ने सुनवाई पूरी घोषित कर फाइल को आदेश पर ले लिया।

सोमवार को डीएलसी ने दोनों पक्षों को बुलवाकर अपना फैसला सुना दिया। डीएलसी रोशन लाल ने अपने फैसले में प्रबंधन के इस तर्क को अमान्य करार दिया कि क्लेमकर्ता वर्किंग जर्नलिस्ट नहीं बल्कि प्रबंधकीय व प्रशासकीय कैडर के हैं। डीएलसी ने क्लेमकर्ताओं के दाखिल क्लेम को सही करार देते हुए चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा के पक्ष में 25,64,976 रूपये, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के पक्ष में 33,35,623 रूपये और सीनियर सब एडिटर निर्मलकांत शुक्ला के पक्ष में 32,51,135 रूपये की वसूली के लिए हिन्दुस्तान बरेली के महाप्रबंधक/यूनिट हेड और स्थानीय संपादक के नाम आरसी जारी करके जिला अधिकारी, बरेली को भेज दी है।

डीएलसी का फैसला आने के बाद हिन्दुस्तान के उच्च प्रबंधन में हड़कंप मच गया। हिन्दुस्तान के आला अधिकारी रविवार शाम से ही बरेली में डेरा डालकर गुप्त बैठकें करके ऐनकेन प्रकारेण आरसी जारी होने से से रूकवाने के लिए रणनीति बनाते रहे लेकिन डीएलसी का फैसला आते ही उनके चेहरे लटक गए। दूसरी ओर, हिन्दुस्तान बरेली के सीनियर कॉपी एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा के दाखिल क्लेम पर उपश्रमायुक्त ने मंगलवार को संपादक को सुनवाई के लिए तलब किया है।

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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हिन्दुस्तान अखबार ने किया पीएफ-डीए घोटाला, पीएम से शिकायत

हिन्दुस्तान अपने हजारों कर्मचारियों को महंगाई भत्ता न देकर पीएफ के अपने हिस्से के करोड़ों रुपये डकार गया। कर्मचारियों के पीएफ का जो बाजिब पैसा उसे भविष्यनिधि खाते में जमा होने चाहिए, वह आज तक हिन्दुस्तान अख़बार के प्रबंधन ने जमा ही नहीं किया है। केंद्र सरकार को ठेंगा दिखाकर हिन्दुस्तान अखबार अपने किसी भी कर्मचारी को डीए(महंगाई भत्ता) नहीं दे रहा है। ताकि पीएफ का पैसा पूरा न देना पड़े, इस घोटाले का खुलासा मजीठिया के योद्धा हिन्दुस्तान बरेली के चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, सीनियर कॉपी एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा ने किया है।

चारों कर्मचारियों ने हिन्दुस्तान के सभी कर्मचारियों व केंद्र सरकार के साथ खुल्लमखुल्ला धोखाधड़ी का मामला बताकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त दिल्ली को वेतन पर्ची के साथ शिकायत भेजकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषियों को जेल भेजने और कर्मचारियों को उनका वाजिब हक़ दिलाने की मांग की है।                   

हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड द्वारा वेतनमान में हेराफेरी के संबंध में भेजी गई शिकायत में कहा गया कि हिन्दुस्तान दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित करने वाली कंपनी हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड ने भविष्य निधि अंशदान बचाने के लिए लगातार वेतनमान मनमाने ढंग से निर्धारित किए। किसी भी कर्मचारी को डीए नहीं दिया जाता है, जो नियमतः दिया जाना अनिवार्य है।

पंकज मिश्रा ने शिकायत में  कहा कि उनकी नियुक्ति हिन्दुस्तान मीडिया वेचर्स लिमिटेड के दैनिक समाचार हिन्दुस्तान की बरेली यूनिट में 22 मार्च, 2010 को वरिष्ठ संवाददाता के पद पर हुई थी। इस दौरान प्रार्थी को बेसिक भुगतान के रूप में रू. 5,667 मासिक का भुगतान किया गया। इसी दौरान रू. 9,081 मासिक स्पेशल एलाउंस के रूप में भुगतान किए गए। बेसिक सेलरी घटाकर स्पेशल एलाउंस के रूप में प्रति माह रू. 9,081 का भुगतान करके प्रबंधन ने सेलरी को मैनेज करने की कोशिश की, जिससे कि उन्हें भविष्य निधि अंशदान अधिक न देना पड़े। शिकायत में आगे कहा गया कि प्रबंधन स्पेशल एलाउंस देकर उनको लंबे समय तक भ्रम में रखकर भविष्य निधि में हेरफेर करता रहा। उल्लेखनीय यह है कि इस दौरान किसी भी तरह का डीए उनको भुगतान नहीं किया गया। डीए न देने से उनको भविष्य निधि के साथ बड़ा नुकसान हुआ है।

पंकज ने शिकायत में कहा कि वर्ष 2016 में प्रबंधन ने स्पेशल एलाउंस की जगह पर्सनल पे के रूप में रू. 16043 का भुगतान मासिक करने लगा जबकि पर्सनल पे की कोई वजह ही नहीं बनती थी। इस दौरान बेसिक पे के रूप में रू. 7376 मासिक भुगतान किया जबकि डीए के रूप में कोई भुगतान नहीं किया गया।

मनोज शर्मा, निर्मल कान्त शुक्ला, राजेश्वर विश्वकर्मा ने शिकायत में कहा कि हिन्दुस्तान मीडिया वेचर्स लिमिटेड बरेली ने डीए न देकर उन लोगों का नुकसान किया है और भविष्य निधि अंशदान में भी गलत तरीके से कटौती की है। इन लोगों ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि प्रकरण में जांच कराके उचित कार्यवाही की जाए और शिकायतकर्ताओं के हित में भुगतान कराया जाए।

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हिन्दुस्तान टाईम्स के बिकने की खबर राज्यसभा में भी गूंजी

शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले अखबार हिन्दुस्तान टाईम्स के रिलायंस के मुकेश अंबानी द्वारा खरीदे जाने का मुद्दा बुधवार को राज्यसभा में भी गूंजा। हालांकि अभी तक हिन्दुस्तान टाईम्स के बिकने की खबर पर न तो हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन ने अपना पक्ष रख रहा है और ना ही रिलायंस की ओर से आधिकारिक बयान आया है।

बुधवार को राज्यसभा में जदयू नेता शरद यादव ने कहा- ”हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया और ये उद्योगपति पत्रकारिता को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इस देश का क्या होगा? अब हिंदुस्तान टाइम्स भी बिक गया? कैसे चलेगा यह देश? यह चुनाव सुधार, यह बहस, ये सारी चीजें कहां आएंगी? कोई यहां पर बोलने के लिए तैयार नहीं है। निश्चित तौर पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जो मीडिया है, लोकशाही में, लोकतंत्र में, यह आपके हाथ में है, इस पार्लियामेंट के हाथ में है. कोई रास्ता निकलेगा या नहीं निकलेगा? ये जो पत्रकार है, ये चौथा खंभा है, उसके मालिक नहीं हैं और हिंदुस्तान में जब से बाजार आया है, तब से तो लोगों की पूंजी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ी है। मैं आज बोल रहा हूं, तो यह मीडिया मेरे खिलाफ तंज कसेगा, वह बुरा लिखेगा। लेकिन मेरे जैसा आदमी, जब चार-साढ़े चार साल जेल में बंद रहकर आजाद भारत में आया, तो अगर अब मैं रुक जाऊंगा तो मैं समझता हूं कि मैं हिंदुस्तान की जनता के साथ विश्वासघात कर के जाऊंगा।”

शरद यादव ने राज्यसभा में आगे कहा कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिकने वाला है। तभी राज्यसभा के दूसरे सदस्यों ने श्री शरद यादव का ध्यान इस ओर दिलाया कि बिकने वाला नहीं बल्कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया है और इसे मुकेश अंबानी ने खरीदा है। इसके बाद श्री शरद यादव ने भी राज्यसभा में कहा कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया। श्री यादव ने कहा कि हमारे लोकतंत्र में बाजार आया, खूब आए लेकिन यह जो मीडिया है, इसको हमने किनके हाथों में सौंप दिया है? यह किन-किन लोगों के पास चला गया है? एक पूंजीपति है इस देश का, उसने 40 से 60 फीसदी मीडिया खरीद लिया है। ये अखबार के पूंजीपति मालिक कई धंधे कर रहे हैं। इन्होंने बड़ी-बड़ी जमीनें ले ली हैं और कई तरह के धंधे कर रहे हैं। वे यहां भी घुस आते हैं। इनको सब लोग टिकट दे देते हैं। मैं आपसे कह रहा हूं इस तरह यह लोकतंत्र कभी नहीं बचेगा।

श्री शरद यादव ने कहा कि इसके लिए एक कानून बनाना चाहिए कि अगर कोई मीडिया हाउस चलाता है या अखबार चलाता है, तो वह कोई दूसरा धंधा नहीं कर सकता है। हिंदुस्तान में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। यह जो पत्रकार ऊपर बैठा हुआ है, वह कुछ नहीं लिख सकता है क्योंकि उसके हाथ में कुछ नहीं है। यही जब सूबे में जाता है तो मीडिया वहां की सरकार की मुट्ठी में चला जाता है। जो पत्रकार सच लिखते हैं उसे निकालकर बाहर कर दिया जाता है। फिर यह देश कैसे बनेगा, आप कैसे सुधार कर लोगे। जदयू नेता ने कहा कि मैं सबसे पूछना चाहता हूं कि सुधार कैसे होगा। इस देश में मीडिया के बारे में बहस क्यों नहीं होती। इस देश में ऐसा कानून क्यों नहीं बनता कि कोई भी व्यापार या किसी तरह की क्रास होल्डिंग नहीं कर सकता? तब हिंदुस्तान बनेगा।

शरद यादव का पूरा बयान देखने के लिये इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें

 

https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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‘हिंदुस्तान’ अखबार से 6 करोड़ वसूलने के लखनऊ के अतिरिक्त श्रमायुक्त के आदेश की कापी को पढ़िए

लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है. लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एमके पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है. इस बाबत खबर तो भड़ास4मीडिया पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है लेकिन आज हम यहां आदेश की पूरी कापी दे रहे हैं… नीचे आर्डर कापी का पहला पेज है….

पेज वन..

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हिन्दुस्तान रांची के हेचआर हेड ने मजीठिया मांगने वाले दो कर्मियों के साथ की बदतमीजी, कॉलर पकड़ हड़काया, गाली दी

हिन्दुस्तान अखबार प्रबंधन इन दिनों मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया मांगने वालों के खिलाफ लगातार दमन की नीति अपना रहा है और अपने ही किये वायदे से मुकर रहा है। रांची में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतन और भत्ते मांगने वाले दो कर्मचारियों ने जब श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगाया तो इनका ट्रांसफर कर दिया गया। जब ये लोग कोर्ट से जीते तो हिन्दुस्तान प्रबंधन को उन्हें वापस काम पर रखना पड़ा। तीन दिन बाद ही जब ये कर्मचारी कार्यालय आकर काम करने लगे तो उन्हें कार्मिक प्रबंधक ने कालर पकड़ कर अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुये जबरी ट्रांसफर लेटर थमाने का प्रयास किया।

लखनऊ में भी हिन्दुस्तान प्रबंधन इसी तरह की रणनीति मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वालों के साथ इस्तेमाल कर चुका है। रांची में भी ऐसा ही किया जा रहा है। यहां मजीठिया वेजबोर्ड की लडाई लड रहे रांची हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत मुख्य उप संपादक अमित अखौरी और वरीय उप संपादक शिवकुमार सिंह के साथ एचआर हेड हासिर जैदी ने 17 फरवरी को करीब पौने पांच बजे शाम को काफी बदतमीजी की।

पहले शिवकुमार सिंह को अपने कक्ष में बुलाकर कॉलर पकड़ा और हड़काया, फिर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि इस लेटर पर साइन करो। उन्होंने पूछा कि लेटर में क्या है, तो एचआर हेड ने कहा कि तुम दोनों का तबादला रांची हेड आफिस से उत्तराखंड के हल्द़वानी में कर दिया गया है। जब शिवकुमार सिंह ने लेटर पर साइन करने से इनकार कर दिया, तो उनके साथ अभद्रता से पेश आते हुए हासिर जैदी ने गाली देते हुए कहा- ”साले पेपर पर साइन करो, नहीं तो दोनों को बड़ी मार मारेंगे, साले तुम लोगों के कारण हम अपनी नौकरी को खतरे में क्यों डालें, अब तुम लोगों को कोई सैलेरी-वैलेरी नहीं मिलेगी, दिल्ली से साला एचआर हेड राकेश गौतम ने तुम लोगों के कारण मेरी नींद हराम कर रखी है।”

शिवकुमार सिंह के हल्ला करने पर कक्ष के बाहर खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे अमित अखौरी दौड़कर कक्ष में घुसे तो उन्हें भी गाली देते हुए हासिर जैदी ने जबरन लेटर पर साइन मांगा। दोनों के इनकार करने पर गार्ड को गेट बंद करने को कहा। फिर कहा कि ठहरो, दोनों ऐसे नहीं मानेगा, सालों तुम दोनों को ठीक करता हूं। यह कहते हुए कक्ष का दरवाजा लगाने के लिए जैसे ही वह आगे बढा, तो अमित अखौरी और शिवकुमार सिंह कक्ष से निकलकर गेट से बाहर भाग खड़े हुए। 

बता दें कि दोनों को श्रम अधीक्षक कोर्ट से तो बड़ी राहत मिली थी। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हिन्दुस्तान प्रबंधन ने 13 फरवरी को दोनों कर्मियों को ज्वाइन करा दिया था। लेकिन हाजिरी बनाने के बाद भी इनसे संपादकीय विभाग में काम नहीं लिया जा रहा था। मजीठिया वेजबोर्ड की अनुशंसा के तहत वेतन, एरियर, भत्ता समेत अन्य सुविधाओं की मांग करने पर इन दोनों कर्मियों को क्रमश: 17 नवंबर और छह दिसंबर 2016 से प्रबंधन ने मौखिक रूप से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

श्रम अधीक्षक कोर्ट के समक्ष हिन्दुस्तान रांची के एचआर हेड हासिर जैदी ने आठ फरवरी को सुनवाई के दौरान इन दोनों कर्मियों का बिना सर्विस ब्रेक किए ज्वाइन कराने और वेतनादि देने पर सहमति व्यक्त की थी। लेकिन पांच दिन के बाद ही दोनों को तबादले का लेटर थमाया जा रहा था। इन दोनों कर्मचारियों का तबादला लेटर बाद में उनके मेल पर भेज दिया गया। आपको बता दें कि इसके पहले भी हिन्दुस्तान प्रबंधन ने लखनऊ में इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। पहले सम्मान के साथ वापस काम पर रखा जाता है फिर बाद में मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वाले कर्मचारियों को टार्चर किया जाता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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यह शख्स जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया!

Deshpal Singh Panwar : अगर ये खबर सच है कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह को मुकेश अंबानी खरीद रहे हैं तो तय है कि अच्छे दिन (स्टाफ के लिए पीएम के वादे जैसे) आने वाले हैं। वैसे इतिहास खुद को दोहराता है… कानाफूसी के मुताबिक एक शख्स जो इस समूह के हिंदी अखबार में चोटी पर है वो जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया।

बनारस के ‘आज’ से लेकर जागरण के आगरा संस्करण का किस्सा हो या फिर वो अखबार जिसके मालिकों की एकता की मिसाल दी जाती थी और एक दिन ऐसा आया कि भाई-भाई अलग हो गए, बंटवारा हो गया, पत्रकारिता के लिए सबसे दुखद दिन था वो, कम से कम हम जैसों के लिए। अगर ये बात सच है तो इतने पर भी इनको चैन पड़ जाता तो खैरियत थी, एक भाई को केस तक में उलझवा दिया, उसके बाद जो हुआ वो भगवान ना करे किसी के साथ हो, वो सब जानते हैं…लिखते हुए भी दुख होता है..

अब अगर हिंदुस्तान समूह के बिकने की बात है तो कानाफूसी के मुताबिक इस हाऊस को भी लगा ही दिया ठिकाने। अगला नंबर मुकेश अंबानी का होगा अगर उन्होंने इन्हें रखा तो, वैसे ये जुगाड़ कर लेंगे, पीएम की तरह बोलने की ही तो खाते हैं.दुख किसी के बिकने और खुशी किसी के खरीदने की नहीं है हां स्टाफ का कुछ बुरा ना हो बस यही ख्वाहिश है। वेज बोरड की वजह से बिक रहा है ये मैं मानने को तैयार नहीं हूं। जो हो अच्छा हो..

कई अखबारों में संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार देशपाल सिंह पंवार की फेसबुक वॉल से.

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मुंबई के बाद अब दिल्ली एचटी को भी रिलायंस को बेचे जाने की चर्चा

देश भर के मीडियामालिकों में हड़कंप, कहीं मुफ्त में ना अखबार बांटने लगे रिलायंस…

देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस वाले मुकेश अंबानी द्वारा मुंबई में एचटी ग्रुप के अखबार मिन्ट और फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स खरीदने की चर्चा के बाद अब यह चर्चा भी आज तेजी से देश भर के मीडियाजगत में फैली है कि मुकेश अंबानी ने दिल्ली में भी हिन्दुस्तान टाईम्स के संस्करण को खरीद लिया है। हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। हिन्दुस्तान टाईम्स के दिल्ली संस्करण में कर्मचारियों के बीच आज इस बात की चर्चा तेजी से फैली कि रिलायंस प्रबंधन और हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन के बीच कोलकाता में इस खरीदारी को लेकर बातचीत हुयी जो लगभग सफल रही और जल्द ही हिन्दुस्तान टाईम्स पर रिलायंस का कब्जा होगा।

रिलायंस के प्रिंट मीडिया में आने और हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की चर्चा के बाद आज देश भर के नामी गिरामी अखबार मालिकों में हड़कंप मच गया। सभी बड़े अखबार मालिकों में इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं जिस तरह रिलायंस ने जियो को लांच कर लोगों को मुफ्त में मोबाईल सेवा प्रदान कर दिया या रिलायंस के आने के बाद जिस तरह मोबाईल फोन जगत में रिलायंस का सस्ते दर का मोबाईल छा गया कहीं इसी तरह प्रिंट मीडिया में भी आने के बाद रिलायंस लोगों को मुफ्त अखबार ना बांटने लगे। ऐसे में तो पूरा प्रिंट मीडिया का बाजार उसके कब्जे में चला जायेगा।

यही नहीं सबसे ज्यादा खौफजदा टाईम्स समूह है। उसे लग रहा है कि अगर रिलायंस हिन्दुस्तान टाईम्स को मुफ्त में बांटने लगेगा या कोई लुभावना स्कीम लेकर आ गया तो उसके सबसे ज्यादा ग्राहक टूटेंगे और उसके व्यापार पर जबरदस्त असर पड़ेगा। आज देश भर के मीडियाकर्मियों में रिलायंस द्वारा मुंबई में मिंट तथा फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की खबर पर जमकर चर्चा हुयी।

कुछ लोगों ने जहां इस फैसले को खुशी भरा बताया वहीं कुछ इस बात से भी परेशान थे कि इस खरीदारी में क्या हिंदी वाले हिन्दुस्तान समाचार पत्र के संस्करण भी खरीदे गये हैं। फिलहाल हिन्दुस्तान के किसी भी संस्करण के रिलायंस द्वारा खरीदे जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है। रिलायंस के प्रिंट मीडिया जगत में आने से छोटे और मझोले अखबार मालिकों में भी भय का माहौल है। उनको लग रहा है कि रिलायंस उनके बाजार को भी नुकसान पहुंचायेगा। फिलहाल माना जा रहा है कि रिलायंस जल्द ही अपना पूरा पत्ता हिन्दुस्तान टाईम्स को लेकर खोलेगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्स्पर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५


पत्रकार Praveen Dixit ने इस प्रकरण के बारे में एफबी पर जो कमेंट किया है, वह इस प्रकार है…

”The silent deal… Last week, HT chairperson Shobhana Bhartiya met up with Reliance supreme Mukesh Ambani. The idea was to sell Mint and eventually, the flagship, Hindustan Times. The second meeting between the merchant bankers in faraway Kolkata and the deal further cemented for Mint. Mint staffers in Mumbai have already moved into the office of CNBCNews18, some fired. This budget, the First Post and CNBC feeds went to Mint Live, an indication that things were working out to mutual benefit.”


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मीडियाकर्मियों ने मांगी छुट्टी तो ‘हिन्दुस्तान’ के संपादक ने दी गालियां!

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर प्रबंधन से मांगने पर स्वामी भक्त संपादकों को भी बुरा लग रहा है। सबसे ज्यादा हालत खराब हिन्दुस्तान अखबार की है। खबर है कि हिन्दुस्तान अखबार के रांची संस्करण के दो कर्मियों अमित अखौरी और शिवकुमार सिंह ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन प्रबंधन से मांगा तो यहां के स्वामी भक्त स्थानीय संपादक  दिनेश मिश्रा को इतना बुरा लगा कि उन्होंने पहले मजीठिया कर्मियों को ना सिर्फ बुरा भला कहा बल्कि एक कर्मचारी को तो गालियां भी दीं। बाद में इन दोनों कर्मचारियों ने विरोध किया तो उन्हें मौखिक रूप से स्थानीय संपादक ने कह दिया कि आप दोनों कल से मत आईयेगा।

सुरक्षागार्ड से भी कह दिया कि इनको गेट के अंदर मत आने देना। इन दो कर्मचारियों में एक डबल एमए है और एक उज्जवल भविष्य की कामना के साथ सरकारी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता में आया था। फिलहाल इस संपादक के खिलाफ दोनों कर्मचारियों ने ना सिर्फ श्रम आयुक्त से शिकायत की है बल्की दूसरे सरकारी महकमों और सुप्रीमकोर्ट को भी इत्तला कर दिया है।

बताते हैं कि २७ अक्तूबर २०१६ को वरीय स्थानीय संपादक दिनेश मिश्र ने छुट्टी नहीं देने के बहाने संपादकीय विभाग में वर्ष २००० से कार्यरत मुख्य उप संपादक अमित अखौरी को काफी जलील किया। उनका इतने से भी मन नहीं भरा तो गाली गलौज भी की। गाली का विरोध करने पर मीडियाकर्मी को बर्बाद करने की धमकी तक दे डाली। यह धमकी अमित अखौरी को १७ नवंबर को भारी भी पड़ गयी। चर्चा है कि पहले तो संपादक ने एचआर के माध्यम से काम करने से मना करा दिया, फिर संपादकीय विभाग में उनकी इंट्री रुकवा दी और तीसरे दिन गेट के अंदर आने से भी मना करवा दिया।

नौकरी से बाहर और वेतन नहीं मिलने से परेशान अमित अखौरी अब सचिव, श्रमायुक्त और उप श्रमायुक्त के यहां न्याय की गुहार लगाते फिर रहे हैं। अब तक न्याय नहीं मिलने से परेशान अमित अब दिल्ली में बैठे अपने वरीय अधिकारियों शोभना भरतिया, शशि शेखर, एचआर हेड राकेश गौतम से गुहार लगा रहे हैं। आशा है कि शायद उनकी पीड़ा का समाधान हो। संस्थान में काम नहीं करने देने से उनके सामने आर्थिक संकट आ गया है। चिंता है कि उनकी दो बेटियों की पढ़ाई कैसे होगी।

अब आइए जानते है कि दूसरे कर्मी शिव कुमार सिंह का क्या हुआ। शिव कुमार सिंह वर्ष 2000 से काम कर रहे हैं पर 1 अगस्त 2010 में कन्फर्म हुए। वह वर्तमान में वरीय उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं। अपनी आदतों से लाचार वरीय संपादक दिनेश मिश्र ने अमित अखौरी को निपटाने के बाद टारगेट शिव कुमार सिंह को बनाया। छोटी-छोटी बातों को लेकर प्रताड़ित करना, सभी कर्मचारियों के सामने जलील करना वरीय संपादक ने रोजमर्रा में शामिल कर लिया। कर्मी शिव कुमार सिंह की गलती सिर्फ इतनी थी कि इन्होंने भी हिन्दुस्तान प्रबंधन से मजीठिया वेतन बोर्ड के तहत वेतन भत्ता समेत अन्य सुविधाएं देने की मांग की थी।

एक कर्मी मजीठिया की मांग करे यह सांमती मानसिकता वाले दिनेश मिश्रा को काफी नागवार गुजरा। उन्होंने अब शिव कुमार को भी निपटाने की ठान ली। हुआ भी ऐसे ही। ६ दिसंबर २०१६ को रोज की तरह जब शिव कुमार अपने काम पर गए तो संपादक के निर्देश पर एचआर हेड हासिर जैदी ने मौखिक आदेश के तहत उन्हें कार्यालय में घुसने से मना कर दिया। शिव कुमार ने कार्यालय में काम करने देने के लिए काफी मिन्नतें कीं पर इसका असर जैदी पर तनिक नहीं पड़ा। शिव कुमार ने जब कहा कि मैं संपादक से इस मामले में बात करना चाहूंगा तो जैदी ने साफ कर दिया कि यह सारी कार्रवाई दिनेश मिश्र के निर्देश पर ही हो रही है।

रांची में किराए के मकान में रह कर हिन्दुस्तान में काम कर रहे शिव कुमार के सामने भी आर्थिक समस्या उत्पन्न हो गयी है। आपको बता दें कि हिन्दुस्तान गोरखपुर में भी इसी तरह संपादक द्वारा सुरेन्द्र बहादुर सिंह को परेशान किया गया था। वजह साफ थी कि सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने प्रबंधन से मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगा था। संपादक ने परेशान किया तो सुरेन्द्र ने मानवाधिकार आयोग और स्थानीय पुलिस तक की शरण ले ली। 

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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विश्वेश्वर कुमार ने क्राइम बीट इंचार्ज अभिषेक त्रिपाठी की ली बलि

वाराणसी : अब बनारस में दिखा मजीठिया बाबा का प्रकोप। मजीठिया वेज बोर्ड का जिन्न समाचारपत्र कर्मचारियों की बलि लगातार ले रहा है। केंद्र व राज्य सरकारों को अपने ठेंगे पर नचा रहे अखबार मालिकों के सम्मुख सुप्रीम कोर्ट से क्या राहत मिलेगी, यह तो कोई नहीं जानता। लेकिन यह राहत कब मिलेगी और तब तक लोकत्रंत का तथाकथित चौथा पाया किस कदर टूट चुका होगा, इसका अहसास होने लगा है।

यूपी का जहां तक सवाल है तो छोटे शहरों की बात ही छोड़िए…. पहले राजधानी लखनऊ, फिर गोरखपुर और अब बनारस में अखबार प्रबंधनों की प्रताड़ना के आगे तीन कर्मकारों को झुकना पड़ा। लखनऊ और गोरखपुर में हिन्दुस्तान प्रबंधन की दबंगई के सामने बीते एक माह में लगभग एक दर्जन पत्रकारों को नौकरी गंवानी पड़ी है और अब वे श्रम विभाग या कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं।

इधर वाराणसी में हिन्दुस्तान के तेजतर्रार युवा क्राइम रिपोर्टर अभिषेक त्रिपाठी को प्रबंधन के उलझाऊ दबाव में पिछले हफ्ते इस्तीफा देना पड़ा। पता चला है कि हिन्दुस्तान वाराणसी में बतौर स्थानीय सम्पादक अपनी दूसरी पारी खेलने आये विश्वेश्वर कुमार को कतरब्यौंत का निर्देश जारी किया गया है। यही वजह है कि सम्पादकजी को, जिन्हें लगभग सात वर्ष पूर्व इसी संस्थान से एक बार बेइज्जत करके निकाला जा चुका है, अति महत्वपूर्ण क्राइम बीट पर तीन रिपोर्टरों की मौजूदगी ज्यादा लगी और उन्होंने फरमान सुना दिया कि इस बीट के लिए एक ही व्यक्ति पर्याप्त है। अंतत: इतना दबाव बढ़ा कि बीट इंचार्ज अभिषेक ने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। अन्य दो में कितनी जान है, यह बताना उचित नहीं होगा।

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार योगेश गुप्त पप्पू की रिपोर्ट.

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मजीठिया मांगने पर हिंदुस्तान प्रबंधन ने अपने चार कर्मियों को नौकरी से निकाला

संजय दुबे ने कानपुर के उप श्रमायुक्त को पत्र लिखकर अपने और अपने साथियों के साथ हुए अन्याय के बारे में विस्तार से बताया है. मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर मांगने पर संजय दुबे, नवीन कुमार, अंजनी प्रसाद और नारस नाथ साह को पहले तो आफिस में घुसने पर रोक लगा दी गई. उसके बाद इन्हें टर्मिनेट कर दिया गया. हिंदुस्तान प्रबंधन के खिलाफ ये चारों कर्मी हर स्तर पर लड़ रहे हैं लेकिन इन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है.

संजय दुबे ने श्रम विभाग कानपुर के उप श्रमायुक्त को जो पत्र भेजा है, उसे प्रकाशित किया जा रहा है. पत्र में संजय का मोबाइल नंबर दिया हुआ है जिसके जरिए उनसे संपर्क कर उन्हें विधिक और अन्य किस्म की सहायता दी जा सकती है. संजय से संपर्क  sanjay_kdubey@rediffmail.com के जरिए भी किया जा सकता है.

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‘हिन्दुस्तान’ और ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के साथियों से एक पत्रकार की अपील

“हिन्दुस्तान” और “हिन्दुस्तान टाइम्स” से पूरे देश में जुड़े साथियों से खुली अपील है कि आप मजीठिया वेज बोर्ड अवार्ड के लिये 17(1) के तहत जमकर क्लेम करें। अगर 11 नवम्बर 2011 के बाद कभी भी रिटायर हुये हैं या जबरन रिजाइन ली गई है तब भी आपका एरियर बनता है। एरियर बनवाने में कोई दिक्कत हो तो मुझसे सम्पर्क करें। अगर आप काम कर रहे हैं तो डरने की जरूरत नहीं है। कंपनी आपको ट्रांसफर करेगी, सस्पेंड कर सकती है, टर्मिनेट करेगी और इनके लोग धमकियां भी देंगे, जैसा कि इन दिनों पूरे देश में हो रहा है। लेकिन भरोसा रखें, ये बिगाड़ कुछ नहीं पाएंगे।

ये वही लोग हैं जो किसी खबर पर एक नोटिस (नाजायज नोटिस पर भी) पर सिर पकड़ लेते हैं। माफीनामा तक छापते हैं। ये लोग सिर्फ आपके डर का फायदा उठा रहे हैं। आप को भरोसा दिला रहा हूं कि अगर न्यूनतम वेतन (मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार) मांगने के बाद ये उत्पीड़न करते हैं, तो कोर्ट का ऐसा डंडा गिरेगा कि अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अगर कोई धमकी देता है तो मुकदमे की तहरीर दें। पुलिस प्रभाव में मुकदमा नहीं लिखेगी, लेकिन कोर्ट से 156/3 में मुकदमा / परिवाद जरूर दर्ज होगा।

भरोसा रखिये, जब आप आंखों में विश्वास के साथ मैदान में होंगे तो इनकी रूह कांप जाएगी। रोजी-रोटी का भय मन से निकाल दें। कचहरी के बाहर चिट्ठी टाइप करेंगे तब भी हजार रूपया रोज लेकर जाएंगे। मंदिर के बाहर शादी-ब्याह की फोटो बनाएंगे तब भी बच्चे भूखे नहीं मरेंगे। कुछ नहीं कर सकते तो मुझसे मिलियेगा, आपके साथ आपके लिये भीख मांगेंगे। चाय भी बेच लेंगे। विश्वास करें, यह सब ज्यादा दिन नहीं करना पड़ेगा।

हमारे डर का लाभ कंपनी को नहीं मिलना चाहिये। हम कटोरा लेकर घूमेंगे लेकिन उन कथित नये नजरिये का दावा करने वाले क्रूर लोगों से लड़ेंगे, जो कद-पद में हमसे बहुत बड़े हैं, लेकिन कलेजा बहुत छोटा है। हमारे हक पर कुंडली मारकर बेठे हैं। ये वही लोग हैं जो योग्यतम पत्रकार और प्रोफेशनल्स की बात करते हैं और तनख्वाह देते हैं नगर निगम कर्मचारी के चतुर्थ श्रेणी के साथी से भी कम। ये चाहते हैं कि पत्रकार हमेशा समाज की सहानुभूति पर पलें और इनकी अपनी जेबें भरती रहें।

कुछ साथी यह भी सोच रहे हैं कि वे मीडिया में जो सम्मान पा रहे हैं, वह बाहर आने पर नहीं पाएंगे। आपकी सोच आंशिक सत्य हो सकती है। पूरा सच नहीं है। एक बात का विश्वास दिलाता हूं कि अगर आप मजीठिया की जंग लड़े तो भले ही कुछ दिनों के लिये अखबार से बाहर जाना पड़ेगा लेकिन आपकी कई पीढ़ियां सम्मान पाएंगी। समाज में लोग आपकी मिशाल देंगे और आपके बच्चों की तरफ हाथ दिखाकर कहेंगे कि इसके बाप/दादा हक के लिये बिड़ला जी की कंपनी से भिड़े थे।

अब डरिये मत। थोड़ा हिम्मत जुटाइये। क्लेम करिये। अगर क्लेम के बाद कार्रवाई हो तो साक्ष्य जुटाइये। हम सभी कोर्ट से बहाली पाएंगे। अगले विजयादशमी के पहले सारे रावण जलेंगे। अब तक एचएमवीएल और एचटी मीडिया के जिन साथियों ने क्लेम किया है और कार्रवाई हुई है, वे मुझसे सम्पर्क करें। हम उनका साथ देंगे।

दोस्त, जो साथी यह सोच रहे कि उन्हें घर बैठे लाभ मिल जाएगा, वे पूरी तरह सही नहीं हैं। ऐसा कोई चमत्कार नहीं होगा। अभी भी वक्त है, देर न करें। क्लेम लगाएं। दिक्कत हो तो फोन करें या कभी भी ई-मेल करें।

आपका साथी
वेद प्रकाश पाठक
पूर्व सीनियर स्टाफ रिपोर्टर
हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड (गोरखपुर यूनिट)
मोबाइल-8004606554
cmdsewa@gmail.com

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मजीठिया मांगने पर ‘हिंदुस्तान’ अखबार ने दो और पत्रकारों को किया प्रताड़ित

लगता है खुद को देश के कानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझ रहा है हिंदुस्तान अखबार प्रबंधन। शुक्रवार को एक साथ उत्तर प्रदेश और झारखण्ड से तीन कर्मचारियों को प्रताड़ना भरा लेटर भेज दिए गए। इन कर्मचारियों की गलती सिर्फ इतनी थी की बिड़ला खानदान की नवाबजादी शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिन्दुस्तान मैनेजमेंट से उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और अपना बकाया मांग लिया था।

गोरखपुर के हिंदुस्तान संस्करण में सीनियर कॉपी एडिटर के पोस्ट पर कार्यरत सुरेंद्र बहादुर सिंह और इसी पोस्ट पर कार्यरत आशीष बिंदलकर को कंपनी ने शुक्रवार को ट्रांसफर और टर्मिनेशान की तरफ कदम बढ़ाते हुए एक पत्र भेजा है। इन दोनों साथियों ने 17 (1) के तहत लेबर विभाग में अपने बकाये की रिकवरी के लिए कलेम लगा रखा था। इस पत्र से इन दोनों साथियों को ज़रा भी अचरज नहीं है। आशीष कहते हैं मुझे लेटर अभी नहीं मिला लेकिन कंपनी ने शुक्रवार को मुझे ऑफिस में काम नहीं करने दिया और बताया कि आपको एक पत्र घर पर भेजा गया है। उधर सुरेन्द्र बहादुर सिंह का ट्रांसफर देहरादून कर दिया गया है।

यही नहीं, झारखण्ड में हिन्दुस्तान समाचार पत्र में कार्यरत उमेश कुमार मल्लिक को हिंदुस्तान प्रबंधन के निर्देश पर एचआर डिपार्टमेंट की तरफ से शुक्रवार को एक मेल  भेजा गया है। उमेश का अपराध बस ये है कि उन्होंने कानून और न्याय के निर्देश का पालन करते हुए मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर व सेलरी देने की मांग अखबार प्रबंधन से कर दी थी। कंपनी टर्मिनेशन के पीछे बहाना खराब परफारमेंस को बना रही है। उमेश दैनिक हिंदुस्तान, रांची के मीडिया मार्केटिंग यानि सेल्स डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं।

इन तीनों साथियों के उत्पीड़न से देश भर में हिंदुस्तान में कार्यरत समाचार पत्र कर्मियों में प्रबंधन के खिलाफ जमकर आक्रोश है। सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने अपने प्रबंधन और संपादक के खिलाफ ना सिर्फ लोकल पुलिस को बल्कि मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत कर रखा है। आप तीनों साथियों से निवेदन है कि आप खुद को अकेले मत समझिये। आपको आपका अधिकार मिलेगा। ये अखबार मालिक सुप्रीम कोर्ट से कतई बड़े नहीं है। आप के साथ आज देश भर के समाचारपत्र कर्मचारी हैं। जल्द ही हिंदुस्तान अखबार की भी चूल हिलेगी।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिवेस्ट
मुंबई
9322411335

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हिंदुस्तान प्रबंधन ने मजीठिया मांग रहे अपने दो पत्रकारों को जान से मारने की धमकी दी

गोरखपुर। मजीठिया वेज बोर्ड के अंतरिम राहत, एरियर और वेतन की लड़ाई में शामिल सीनियर कापी एडिटर सुरेंद्र बहादुर सिंह और आशीष बिंदलकर को हिन्दुस्तान गोरखपुर यूनिट के एचआर प्रबंधन से जान से मारने की धमकी मिली है। यह धमकी स्थानीय एचआर मो. आशिक लारी और सेक्योरिटी ने दी है। दोनों का यूनिट में प्रवेश बैन कर दिया गया है। गाली और धमकी देते हुये एचआर ने सुरेंद्र को ट्रांसफर आर्डर पकड़ा दिया। आशीष को फोन पर और यूनिट गेट पर धमकी देकर भगा दिया गया। आशीष सीनियर कापी एडिटर हैं और उन्हें बिना कोई टर्मिनेशन लेटर दिये गेट से खदेड़वा दिया गया। इस मामले में दोनों पत्रकारों ने थाना चिलुआताल में तहरीर देने की कोशिश की जो रिसीव नहीं हुई। पत्रकारों की तहरीर ही नहीं ली जा रही है।

पत्रकारों का आरोप है कि कंपनी की मालकिन शोभना, चीफ एडिटर शशीशेखर और एचआर हेड के कहने पर ऐसा आपराधिक काम किया गया। ये सभी लोग आपराधिक साजिश में शामिल हैं। पत्रकारों के आरोप वाली तहरीर को यूपी पुलिस ट्विटर सेवा पर वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट वेद प्रकाश पाठक ने अपने ट्विटर एकाउंट से भेज दी है। गोरखपुर पुलिस की जानकारी में पूरा मामला ट्विटर के जरिये आ चुका है। Cognizable offence के इस प्रकरण में प्रभावशाली लोगों के शामिल होने के कारण पुलिस खासा दबाव में है। और पुलिस सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय की अवमानना कर रही है जो ललिता कुमारी बनाम यूपी स्टेट के मामले में पहले ही दिया जा चुका है।

पुलिस तहरीरें मिलने से इनकार न कर सके लिहाजा श्री पाठक ने दोनों तहरीरों को डीजीपी, होम विभाग, आईजी, डीआईजी, एसएसपी और एसपी सिटी को भी ट्विटर के जरिये भेजकर फौरन मुकदमे की मांग की गई है। तीनों पत्रकारों (वेद प्रकाश, सुरेंद्र और आशीष)ने देर शाम सीओ गोरखनाथ से भी मुलाकात की। सीओ ने मामले में जांच का मौखिक आश्वासन दिया है। सुरेंद्र के उत्पीड़न मामले में बहुत पहले सीओ गोरखनाथ को कार्रवाई का आदेश हो चुका है। पुलिस ने उनसे सम्पर्क भी किया था लेकिन वह दिल्ली इलाज के लिये गये थे। वहीं उनका मोबाइल भी चोरी हो गया लिहाजा पुलिस से सम्पर्क कट गया। सीओ गोरखनाथ ने आश्वासन दिया है कि वह पुरानी फाइल का भी अवलोकन करेंगे और उचित कार्रवाई होगी।

पत्रकार आशीष का कहना है कि एचआर ने कल यानी 7 अक्टूबर 2016 को पहले उन्हें फोन पर गाली दी और जान से मारने की धमकी दी और बाद में कंपनी के गेट पर पहुंचने पर सेक्योरिटी से धमकी दिलवाया। उन्हें मौखिक गालियों और धमकी के साथ मौखिक रूप से टर्मिनेट किया गया है। कंपनी ने उन्हें कोई लिखित टर्मिनेशन नहीं दिया और न हीं उन्हें कोई कारण बताया गया। सिर्फ गालियां और धमकी दी गई। सुरेंद्र को दफ्तर में गालियां और धमकी दी गईं। तीनों पत्रकारों ने खुद को कंपनी से जान का खतरा और फर्जी मामले में जेल भिजवाने की आशंका जताई है और पत्रकार बिरादरी से मदद की अपील की है। उन्होंने कहा है कि चूंकि तीनों का कंपनी पर करीब 90 लाख का क्लेम बन रहा है लिहाजा कंपनी दबाव व आपराधिक कारनामे का कोई हथकंडा नहीं छोड़ रही है।

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खबर से भड़के डीएम ने जारी किया आदेश : ‘हिंदुस्तान’ अखबार के इस उगाहीबाज रिपोर्टर को आफिस में घुसने न दें!

Dinesh Singh : मैं नहीं जानता कि बाका के जिलाधिकारी के दावे में कितनी सच्चाई है। बिहार में हिन्दुस्तान की स्थापना के समय से जुड़े होने के चलते मैंने देखा है कि रिमोट एरिया में ईमानदारी के साथ काम करने वाले पत्रकार भी भ्रष्ट अधिकारियों के किस तरह भेंट चढ़ जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सारे पत्रकार ईमानदार हैं मगर मैं यह भी कदापि मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि सारे पत्रकार चोर और ब्लैकमेलर ही होते हैं।

सच यह है कि बिहार में मध्याह्न भोजन के नाम पर जहां भी हाथ डालिए और खास कर बाका, मुंगेर और जमुई जिले में, केवल लूट और बदबू ही मिलेगा। यदि किसी पत्रकार से शिकायत थी तो सबसे पहले संपादक से शिकायत करनी चाहिए थी। संपादक द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का रास्ता खुला था। मगर नहीं। डीएम ने सीधे तुगलकी फरमान जारी कर दी।

भागलपुर के संपादक बदले हैं और सुना है ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई भी करते हैं। किन्तु लगता है अनुभवहीन जिला अधिकारी ने भ्रष्ट अधिकारियों के प्रभाव में आकर कोई बड़ा बवंडर कर दिया हो। अखबार के संपादक से मैं निवेदन करना चाहता हूं कि वे इस मामले मे तत्काल कार्रवाई करें ताकि पत्रकारिता की मर्यादा बिहार में अक्षुण्ण बनी रहें।

हिंदुस्तान अखबार के विशेष संवाददाता रह चुके पत्रकार दिनेश सिंह की एफबी वॉल से.

नीचे वो खबर है जिससे भड़के बांका के जिलाधिकारी ने रिपोर्टर को उगाहीबाज करार देते हुए आफिसियल लेटर जारी कर दिया…. खबर को साफ-साफ पढ़ने के लिए नीचे दी गई न्यूज कटिंग के उपर ही क्लिक कर दें :

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Niraj Ranjan अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है. चौथे स्तंभ को हिलाना मुश्किल है.

Uday Murhan मीडिया संस्थानों और पत्रकारिता जगत पर भी सवाल है . दूसरे क्या करेंगे और करना चाहिये दूसरे जानें .मीडिया जगत सोचे .

Brajkishor Mishra सत्यप्रकाश जी को बधाई। एक जिला अधिकारी को आपके कारण इस ओछेपन पर आना पड़ा। डीएम द्वारा लिखे गए डिपार्टमेंटल लेटर के सेंटेंस से स्पष्ट है कि मामला मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग का नहीं है। कही न कही आपकी किसी और रिपोर्टिंग से डीएम की फटी पड़ी है। जिसका खुन्नस वो मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग के नाम पर निकल रहा है। यदि मामला उगाही का होता तो डीएम एफआईआर भी दर्ज करा सकता था। लेकिन शायद कोई सबूत नहीं। डीएम साहब मध्यान भोजन आप नहीं खाते। वो देश के भविष्य, बच्चो के विकास के लिए है। पत्रकार छोड़िये, यदि मध्यान भोजन के गुणवत्ता में किसी भी व्यक्ति को शक होता है तो रसोई देखना उसका अधिकार है। बांका के पत्रकार बंधुओ का आग्रह हैं की पता करें इस डीएम को मंथली उगाही कौन-कौन से विभाग से कितनी पहुँचती है। अखबार में खबर नहीं लग पाती तो इनकी ईमानदारी की सबूत सोशल मीडिया पर डालिये।

Jayram Viplav डीएम के लिखने का अंदाज दाल में काला है ।

Dinesh Singh उदय जी, सवालो के घेरे मे आज कौन नही है। कस्बाई पत्रकारिता की स्थिति जानिए । दस रुपये प्रति खबर पर काम करता है और महीने मे दस खबर नही छपती है। मिलता है एक खबर पर दस रुपये मगर खर्चा पड़ता है 50 रु। अखबार को उसी के माध्यम से विज्ञापन भी चाहिए । वह भ्रष्ट और चोरी नेताओ की चाकरी मे लगा रहता है कि कुछ ऐड मिलेगा । उसे परिवार भी चलाना है। कठिनाई तब हो जाती है जब ओहदा और सैलरी मिल जाने के बाद भी गंदगी फैलाते हैं। धुआं वही से उठता है जब कही आग लगा होता है । विशेश्वर प्रसाद के समय मे हिन्दुस्तान भागलपुर मे कंट्रोवर्सी मे रहा और खबर छापने के लिए पैसे मांगने के खिलाफ बहुत सारे होल्डिंग्स भी टंगे । मै नही जानता की उस आरोप मे कितनी सच्चाई थी मगर चुने हुए बदनाम पत्रकारो को मिला संरक्षण और शहर के धंधेवाजो से उनके रिश्ते उनकी बदनामी को हवा देता रहा। मगर आप ही बताइए विशेश्वर प्रसाद और अक्कु श्रीवास्तव जैसे लीग जो कभी -कभी संपादक बन जाते है वही पत्रकारिता के चेहरे बनेगे या ईमानदार संपादको की भी चर्चा होगी? मैं दावे के साथ कहा सकता हू की आज भी पत्रकारिता मे ईमानदारी अन्य सभी क्षेत्रो की तुलना मे ज्यादा बची हुई है।

Uday Murhan एकदम सहमत . मेरा आशय आप से भिन्न नहीं है .

Brajkishor Mishra दिनेश सर, पत्रकारिता में सबसे बड़ी दिक्कत है की एक पत्रकार ही दूसरे पत्रकार की लेने में लगा हुआ है … अपने गिरेबाँ देखना किसी को पसंद नहीं।
Jayram Viplav पत्रकारिता और राजनीति “सेवा” के क्षेत्र है यहाँ कदम कदम पर नैतिकता और मूल्यों का तकाजा है लेकिन जब लोग इसे पैशन की जगह प्रोफेशन बना लेंगे तो क्या होगा? और हां यदि जिला ब्यूरो से नीचे प्रखंडों में काम करना हो तो आर्थिक रूप से मजबूत हो।

Dinesh Singh जिला अधिकारी के खिलाफ सत्यप्रकाश मानहानि का मुकदमा करें । मैं हर तरह से मदद के लिए तैयार हूं ।

Brajkishor Mishra विशेश्वर कुमार सर के साथ 12 साल पहले मुझे 2 साल काम करने का मौका मिला था, बड़े ही खड़ूस संपादक थे। जर्नलिज्म को छोड़ कर अपनापन नाम की कोई चीज ही नहीं। बड़े ही सेल्फिश संपादक हैं। सिर्फ खबर से मतलब रखते हैं। एक बार तो दूसरे संस्थान में किसी कारण परेशान हो उनसे नौकरी मांगा था सीधे ना कर बैठे। भविष्य में भी उनसे किसी फेवर की उम्मीद नहीं। लेकिन ये दावे के साथ कह सकता हूँ उनके जैसे पत्रकार और संपादक होना आसान नहीं। अकेले वो दस पत्रकार पर भाड़ी हैं। पत्रकार के सम्मान की सुरक्षा के लिए हमेशा सबसे आगे रहे है। वो कभी-कभी नहीं मेरे सामने बीते डेढ़ दशक में तीन जगहों पर स्थानीय संपादक के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किये हैं। मैंने बोल्ड जर्नलिज्म उनसे ही सीखा है।

Dinesh Singh पत्रकारिता केवल खबरों का लेखन नहीं है। यह एक आन्दोलन भी है । भारत मे पत्रकारिता का जन्म ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से हुआ है। शहर का एक बड़ा व्यापारी शहर मे होर्डिन्ग लगाकर पैसा माँगने का आरोप लगाए और संपादक खामोश रहे यह कैसा वोल्डनेस है? काम करना और स्वाभिमान के लिए चट्टान से टकरा जाना अलग -अलग बात है। पत्रकारिता मे ईमानदारी और निर्भिकता बाहर से भी दिखनी चाहिए। यह मानहानि का मुकदमा बनता था। कुछ नही होने से पूरी टीम का सर शर्म से झुका रहा। मै मानता हूं कि आरोप गलत थे जैसे सत्यप्रकाश पर लगे आरोप गलत हैं। मगर चुप रह जाओगे तो लोग तरह -तरह के मतलब निकालेगे ही।
अजय झा ऐसे पत्रकार को सलाम जिसके लेखन से प्रशाशन की….

Sanjay Kumar Singh मैं भी एक पत्रकार हूँ। दो दशक से अधिक समय से इससे जुड़ा हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पत्रकारिता कभी चाटुकारिता में बदलेगी लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दे तो यह अब इससे भी नीचे दलाली में बदल गई है। हर कोई अपना एजेंडा लेकर चल रहा है। जिसमे पत्रकारिता मुखौटा बना हुआ है। सिवान, छपरा, बांका से लेकर पटना तक ऐसे मुखौटाधारि बैठे हुए हैं। ऐसे लोगों को कौन बेनकाब करेगा, शायद कोई नहीं, क्योंकि ये लोग अब सिस्टम में शामिल हो चुके हैं। दिनेश जी को बधाई… सिवान की ईमानदारी भी सीबीआई जरूर सामने लाएगी

Hari Prakash Latta आँख मूँदकर किसी को समर्थन देना या झुटला देना गलत है। बिना सत्यता जाने किसी एक व्यक्ति , घटना को केंद्रित कर सैद्धान्तिक बहस का कोई अर्थ नहीं होता है। हिंदुस्तान के सम्पादक को इन्क्वारी कर उचित निर्णय लेना चाहिए

Kumar Rudra Pratap मैंने देवरे को जाना है गया कार्यकाल के दौरान, ईमानदार और निडर अब तक।

Omprakash Yadav दिनेश जी जिलाधिकारी बाँका का तुगलकी भी कह सकते है और महाराष्ट्रीय फरमान भी कह सकते है आज के दौर का।जिस तरह महाराष्ट् में उत्तर भारत के लोगो को घुसने पर पावंदी हो गया है, चुकी बाँका के जिलाधिकारी महाराष्ट्रा के हैं और बाँका में उसी तर्ज पर काम कर रहे हैं। दिनेश जी आपने सही अनुमान लगाया की मध्यान भोजन बाला मामला बहाना है। एक समाचार पर जिलाधिकारी भड़के हैं।

Neel Sagar यदि सत्यप्रकाश जी पर आरोप गलत लगा है जो सत्य से परे है तो तत्काल उन्हे राय दिजिए कि डी0एम0 के खिलाफ भा0द0सं0 की धारा 499 के आधार पर मान-प्रतिष्ठा के साथ खेलने के लिए 25 लाख रूपया का मानहानि दायर करें।-सम्पादक-नील सागर दैनिक पटना -9835482126

Dinesh Singh अब तुगलकी फरमान जारी करने वाले बाका के जिला अधिकारी का असलियत सामने आ चुका है। —खबर पढ़कर बौखलाए जिला अधिकारी और कुछ नहीं बल्कि अहंकार का नाजायज पैदाइस है। –बिहार मे रहकर बिहारी को गाली देने वाले को तत्काल प्रभाव से सरकार निलम्बित करे। — पूरा बिहार सत्यप्रकाश के साथ है। अब बात साफ हो गई है कि माजरा क्या है । हमारी पत्रकार विरादरी कुछ आदत से लाचार है। ईमानदारी का सार्टिफिकेट हम मुफ्त मे बाटते है। यार पहले अपनी विरादरी पर गर्व करना सीखो। मै पहले ही कह चुका हूं कि पत्रकार विरादरी मे आज भी ईमानदारी बहुत हद तक कायम है। तुम बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई पर पलते हो और बिहारी को ही गाली बकते हो। यहा का आदमी जब महाराष्ट्र काम की तलाश मे जाता है तो नपुंसको की परवरिश बनकर हमला करते हो और बिहार आकर बिहारी पर ही रोब गाठते हो। कम से कम सत्यप्रकाश जैसे पत्रकार के रहते यह नही चलने वाला है । सत्यप्रकाश की रिपोर्टिंग यह साबित करता है कि वह पत्रकारिता का हीरो है। सत्यप्रकाश को तुम सरकारी कार्यालय जाने से नही रोक सकते । तुम अपना देखो की तुम कैसे जाओगे । वक्त आ गया है पत्रकार विरादरी अपनी एकजुटता दिखाए।

Amit Roy सत्यप्रकाश जी दुर्गापूजा के बाद इस दिशा में कोई ठोस निर्णय ले।हमलोग आपके हर कदम पर साथ है।

Guddu Rayeen मेरा एक ही हिसाब है ऐसे कलकटर को बिहार से उठा कर बाहर फेक देना चाहिऐ

Himanshu Shekhar Hahaha sir ne article 19 Ni padhe Kya.??? Kabhi bihari word use krte hai kabhi Kuch ? Bhagwan bharose hai Banka zila soch samjhdar kr cmnt kijye sir PTA Ni it act me jail daal Diya jaye

Ashish Deepak इस प्रकार का फरमान पुर्वाग्रह से प्रेरित लगता है। कहीं पत्रकार महोदय ने कड़वा सत्य तो नही लिख डाला ।

Nabendu Jha इस बात को रखने का यह तरीका सही नहीं। बल्कि ,इसके लिए एक जिम्मेदार अधिकारी को बात रखने की सही जगह की जानकारी होनी चाहिए । इसे वापस ले।

Pushpraj Shanta Shastri जिलाधीश ने किसी साक्ष्य के बिना जो निर्देश जारी किया है, यह आश्चर्यजनक नहीं है। हमारी पत्रकारिता ने डीएम से लेकर सीएम की आलोचना की आदत छोड़ दी है। जिलाधीश के पास अगर संवाददाता के द्वारा रिश्वत मांगने के साक्ष्य थे तो उन्हें किसने प्राथमिकी दर्ज कराने से रोका था? मुझे इस फरमान की भाषा में जिलाधीश प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत हो रहे हैं। बिहार के वरिष्ठ पत्रकारों को इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए। मैं इस मसले के तथ्यान्वेषण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हूँ, शर्त यह है कि अपने कुछ बंधु साथ शरीक हों। पत्रकारिता कथ्य के बावजूद तथ्य की मांग करता है। जिलाधीश के पक्ष-विपक्ष में तत्काल कोई राय प्रकट करना अनुचित है। महाराष्ट्र-बिहार के प्रदेशवाद की चर्चा फूहड़ता है। जिलाधीश का पत्र तथ्य के बिना कथ्य पर आधारित है इसलिए कथ्य के भीतर की हकीकत के पड़ताल की जरुरत है।

Dinesh Singh जिला अधिकारी किसी वजह से इस तुगलकी हरकत पर उतरे वह प्रकाशित खबर तथ्य बनकर सामने है।

Awadhesh Kumar arajak bihar ka namuna. Jab rajneeti fail karte hi to yehi hota hi.ek dm bihar mei…

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